रांची में शहरी वोटरों की उदासीनता, मतदान औसत से भी कम

रांची में मतदान प्रतिशत काफी कम
Jharkhand Civic Polls: झारखंड में निकाय चुनाव का प्रचार जोरशोर से किया जा रहा है. हर प्रत्याशी जीत का दावा कर रहा है, लेकिन उसे मतदाताओं के मूड का पता नहीं है. खासकर, रांची के शहरी मतदाताओं की बात करें, तो वे काफी उदासीन हैं. रांची नगर निगम चुनाव में शहरी मतदाताओं की उदासीनता काफी है. पिछले चुनावों में रांची में मतदान प्रतिशत राज्य में औसत से काफी कम है. रांची नगर निगम के चुनावों में मध्यम वर्ग की बेरुखी लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए चुनौती बनती जा रही है. नीचे पूरी खबर पढ़ें.
Jharkhand Civic Polls: झारखंड में शहर की सरकार चुनने को लेकर राजधानी रांची के मतदाताओं में उत्साह की भारी कमी देखी जा रही है. आंकड़े गवाह हैं कि रांची नगर निगम के चुनावों में मतदान का प्रतिशत लगातार राज्य के औसत आंकड़ों से काफी नीचे रहा है. शहरी लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में राजधानी रांची के शिक्षित और मध्यम वर्गीय मतदाताओं की यह उदासीनता प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है.
मतदाताओं की भागीदारी में धीमा सुधार
रांची नगर निगम के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो मतदाताओं की भागीदारी में सुधार की गति बेहद धीमी है. साल 2008 में हुए पहले नगर निगम चुनाव में महज 36 प्रतिशत मतदान हुआ था. पांच साल बाद 2013 के चुनाव में यह आंकड़ा मामूली बढ़त के साथ 38 प्रतिशत तक पहुंचा. वहीं, 2018 के पिछले निकाय चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 49.3 प्रतिशत दर्ज किया गया. हालांकि, यह रांची का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, लेकिन इसके बावजूद आधे से ज्यादा मतदाताओं ने बूथ तक जाने की जहमत नहीं उठाई.
छोटे निकायों ने पेश की मिसाल
रांची के विपरीत, राज्य के अन्य छोटे नगर निकायों में मतदाताओं ने जबरदस्त भागीदारी दिखाई है. साल 2018 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के विभिन्न नगर निकायों का औसत मतदान लगभग 65.15 प्रतिशत रहा था. इस तुलना में रांची नगर निगम करीब 16 प्रतिशत पीछे रहा. विशेषज्ञों का मानना है कि बुंडू, लोहरदगा या अन्य छोटे निकायों में स्थानीय मुद्दों जैसे सड़क, पानी और नाली से मतदाताओं का सीधा जुड़ाव होता है, जिसके कारण वहां मतदान का स्तर ऊंचा रहता है.
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बड़े शहरों में मध्यम वर्ग की बेरुखी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बड़े शहरों में मध्यम वर्गीय मतदाता स्थानीय निकाय चुनाव को अपेक्षाकृत कम महत्व देते हैं. रांची जैसे महानगर में एक बड़ा वर्ग अपनी नागरिक सुविधाओं के लिए स्वयं के संसाधनों (जैसे निजी बोरिंग या जनरेटर) पर निर्भर रहता है, जिससे ‘शहरी सरकार’ की भूमिका उनके लिए गौण हो जाती है. मतदाता उदासीनता राजधानी में कम वोटिंग का सबसे बड़ा कारण है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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