आदिवासी समुदाय के लिए कुछ भी असुंदर नहीं, अस्वीकार्य नहीं, पुस्तक उत्सव में बोलीं वंदना टेटे

डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय शोध कल्याण संस्थान के निदेशक रणेंद्र ने कहा कि साहित्यिक रचनाओं में एक इतिहास छिपा रहता है. उन्होंने कहा कि ‘शाल डूंगरी का घायल सपना’ उपन्यास में झारखंड बनने के बाद की राजनीति की कटु सच्चाइयों का सजीव चित्रण किया गया है.
झारखंड की राजधानी रांची में आयोजित किताब उत्सव के तीसरे दिन का पहला सत्र ‘हमारा झारखंड हमारा गौरव’ झारखंड की विचारक-कथाकार एलिस एक्का पर केंद्रित रहा. इस सत्र में आदिवासी विमर्श की चिंतक वंदना टेटे ने उनके जीवन और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि एलिस एक्का ने न सिर्फ साहित्य बल्कि विविध क्षेत्रों में काम किया. उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था. उनके लेखन में कोई बनावट नहीं है. आदिवासियों की खास बात होती है कि वो एकसाथ कई भाषाएं जानते हैं. एलिस भी कई भाषाएं जानतीं हैं. उनकी कहानियां सिर्फ महिला प्रधान नहीं हैं. उनकी रचनाओं में समाज के भेदभाव का भी स्पष्ट वर्णन मिल जाता है. उन्होंने कहा कि आदिवासी कहानियां बहुत आशावादी होती हैं. एलिस की कहानियों में प्रकृति का चित्रण बहुत सहज ढंग से किया गया है. साहित्य के माध्यम से ही हम दुनिया को अपने समाज के बारे में बता सकते हैं. जब तक हम अपने अतीत को नहीं जानेंगे, हम आदिवासी मूल्यों को मजबूती से नहीं लिख पाएंगे.
उपन्यास ‘शाल डूंगरी का घायल सपना’ पर केंद्रित दूसरे सत्र में मनोज भक्त, साहित्यकार पंकज मित्र, सावित्री बड़ाइक और विनोद कुमार सिंह ने अपनी बातें रखीं. इस सत्र में डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय शोध कल्याण संस्थान के निदेशक रणेंद्र ने कहा कि साहित्यिक रचनाओं में एक इतिहास छिपा रहता है. उन्होंने कहा कि ‘शाल डूंगरी का घायल सपना’ उपन्यास में झारखंड बनने के बाद की राजनीति की कटु सच्चाइयों का सजीव चित्रण किया गया है. वहीं, उपन्यास के लेखक मनोज भक्त ने बताया कि कैसे झारखंड आंदोलन ने उनको इस उपन्यास को लिखने के लिए प्रेरित किया. कहा कि उनके गांव के आसपास आदिवासी समाज पर जो जुल्म होते थे, उन घटनाओं को उन्होंने कहानी के माध्यम से लोगों के सामने लाने का प्रयास किया है.
सावित्री बड़ाइक ने कहा कि इस उपन्यास को पढ़ते वक्त उन्हें इनके किरदारों में मानव तस्करों की शिकार हो रही गुमला और सिमडेगा की बच्चियों की झलक दिखाई पड़ती है. पंकज मित्र ने कहा कि उपन्यास में राजनीति के घात-प्रतिघात को हॉकी खेलती लड़कियों के जरिए बयां किया गया है. इस उपन्यास की स्त्री प्रधान नायिका भी महत्वपूर्ण अंग है, जो आदिवासी स्त्रियों के प्रतिरोध को दर्शाती है. जिस सपने के साथ इस राज्य का निर्माण हुआ, वो सपना अब घायल हो गया है. उसी घायल सपने के दर्द का बखान उपन्यास ने किया है. विनोद कुमार सिंह ने कहा कि ‘शाल डूंगरी का घायल सपना’ उपन्यास झारखंड बनने के सुनहरे ख्वाब और बनने के बाद की काली सच्चाइयों के द्वंद्व को दर्शाता है.
आदिवासी साहित्य का सौंदर्यशास्त्र
‘आदिवासी साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर केंद्रित सत्र में वंदना टेटे, जिंदर सिंह, पार्वती तिर्की और रवि भूषण ने अपनी बातें रखीं. पार्वती तिर्की ने कहा कि झारखंड के लोकगीत आदिवासी साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के सबसे मजबूत स्तंभ हैं. वंदना टेटे ने कहा कि आदिवासी शास्त्र से संचालित नहीं होते. आदिवासी समुदाय का मानना है कि इस सृष्टि में कुछ भी असुंदर नहीं है, कुछ भी अस्वीकार्य नहीं है. पुरखा गीतों और लोकगीतों में युद्ध की भावना नहीं, ये आदिवासी साहित्य की सहजता का सौंदर्य बोध है. आदिवासी सौंदर्य बोध में समाज के बनाए सुंदरता के मापदंडों को नकारते हैं.
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सौंदर्य और प्रेम सारी कलाओं के प्रेरक : जिंदर सिंह मुंडा
डॉ जिंदर सिंह मुंडा ने कहा कि सौंदर्य और प्रेम सारी कलाओं के प्रेरक हैं. आदिवासी साहित्य में सौंदर्य सिर्फ जल जंगल जमीन नहीं, बल्कि यहां की करुणा, पीड़ा, प्रतिरोध और उनके जीवन संघर्ष भी सौंदर्य हैं. अंतिम वक्ता आलोचक रवि भूषण जी ने कहा कि सौंदर्य बोध जीवन और मूल्यों से जुड़ा होता है. किताब उत्सव में 21 दिसंबर को पहले सत्र ‘हमारा झारखंड हमारा गौरव’ में डॉ रामदयाल मुंडा को याद किया जाएगा. दूसरे सत्र में आदिवासी कथावाचन परंपरा विषय पर बातचीत होगी. वहीं, तीसरे सत्र में आदिवासी लोकगीतों की परंपरा और आधुनिक काव्य संवेदना विषय पर चर्चा होगी.
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By Mithilesh Jha
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