रांची: नामकुम अंचल में म्यूटेशन के दस्तावेज गायब होने के मामले में एसीबी ने लिया समय

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झारखंड हाइकोर्ट

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Jharkhand High Court: नामकुम अंचल क्षेत्र में म्यूटेशन दस्तावेज गायब होने और कथित हेरफेर के मामले में दायर अवमानना याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. इससे जुड़ी पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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रांची से राणा प्रताप सिंह की रिपोर्ट 

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Jharkhand High Court: झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस राजेश शंकर की अदालत में नामकुम अंचल क्षेत्र में जमीन से जुड़े म्यूटेशन दस्तावेजों में हुई कथित हेरफेर के मामले में दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई की. मामले की सुनवाई के दाैरान अदालत ने एसीबी का पक्ष सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 जून की तिथि निर्धारित की. इससे पूर्व प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता जेजे सांगा ने पैरवी की.

अदालत से मांगा समय

वहीं एसीबी की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने पक्ष रखते हुए अदालत को माैखिक रूप से बताया कि म्यूटेशन रिकॉर्ड के गायब होने के मामले में जांच की जा रही है. अदालत के आदेश के आलोक में एसीबी ने प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है. इंटेलिजेंस रिपोर्ट की गई है. अगली सुनवाई में जांच से संबंधित रिपोर्ट पेश करने के लिए गाड़ोदिया ने अदालत से समय देने का आग्रह किया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी थॉमस साइमन साइरिल हंस ने अवमानना याचिका दायर की है. उन्होंने एकल पीठ के आदेश का अनुपालन कराने की मांग की है. एकल पीठ ने प्रार्थी को उसकी 1.22 एकड़ जमीन से संबंधित म्यूटेशन केस का सर्टिफाइड कॉपी देने का आदेश दिया था. 

क्या है मामला?

प्रार्थी की मां ने उक्त जमीन वर्ष 1969 में खरीदी थी. आरोप है कि उनकी जमीन का नामकुम अंचलाधिकारी ने किसी दूसरे के पक्ष में म्यूटेशन कर दोहरी जमाबंदी कायम कर दी थी. जब प्रार्थी को सूचना मिली, तो अपील दायर करने के लिए सर्टिफाइड कॉपी के लिए आवेदन दिया, लेकिन सर्टिफाइड कॉपी नहीं दी गई. जिसके बाद उन्होंने हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी. एकल पीठ के आदेश के बाद भी उन्हें सर्टिफाइड कॉपी नहीं मिलने पर अवमानना याचिका दायर की है. पूर्व की सुनवाई में जब अदालत ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया, तो सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इस जमीन के म्यूटेशन से जुड़े दस्तावेज अंचल कार्यालय में नहीं है. गायब हैं. इस पर अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए मामले को एसीबी को जांचने का निर्देश दिया था. अदालत ने कहा था कि किसी सरकारी कार्यालय से भूमि संबंधी महत्वपूर्ण व संवेदनशील रिकॉर्ड का इस तरह गायब हो जाना कोई सामान्य बात नहीं मानी जा सकती. यह सीधे तौर पर गंभीर लापरवाही या फिर किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है.

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