झारखंड में बालू के विकल्प के रूप में बड़े पैमाने पर M-सैंड परियोजना की शुरुआत, जानिए इसके उत्पादन के लाभ

कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियां एम-सैंड परियोजना शुरू करने जा रही हैं. इसके लिए सीसीएल के कथारा में 500 क्यूबिक मीटर प्रतिदिन उत्पादन क्षमता वाला प्लांट लगाया जा रहा है. दिसंबर 2023 से इसके शुरू होने की संभावना है.
Ranchi News: कोल इंडिया लिमिटेड नदी के प्राकृतिक बालू के विकल्प के रूप में एक ‘निर्मित बालू’ ला रहा है, जिसे एम-सैंड (मैन्युफैक्चर्ड सैंड) भी कहा जाता है. कोल इंडिया इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने जा रहा है. देशभर में कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियां एम-सैंड परियोजना शुरू करने जा रही हैं. इसके लिए सीसीएल के कथारा में 500 क्यूबिक मीटर प्रतिदिन उत्पादन क्षमता वाला प्लांट लगाया जा रहा है. दिसंबर 2023 से इसके शुरू होने की संभावना है. इसके अलावा बीसीसीएल के बरोरा क्षेत्र में 1000 क्यूबिक मीटर प्रतिदिन उत्पादन क्षमता वाला प्लांट लगाया जा रहा है, जिससे जुलाई 2024 में उत्पादन होने की उम्मीद है. दोनों प्लांटों के लिए निविदा की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है.
कोल इंडिया लिमिटेड के अधिकारियों ने बताया कि खान और खनिज (विकास एवं विनियम) अधिनियम-1957 (एमएमडीआर अधिनियम) के तहत रेत को लघु खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है. बालू जैसे खनिजों का प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकारों के पास है. इसे राज्य के विशिष्ट नियमों के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है. बहुत अधिक मांग, नियमित आपूर्ति और मॉनसून के दौरान नदी के इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए रेत खनन पर पूर्ण प्रतिबंध के कारण नदी की रेत का विकल्प खोजना बहुत जरूरी हो गया है.
ऐसे में खान मंत्रालय ने ‘सैंड माइनिंग फ्रेमवर्क-2018’ में कोयले की खानों के ओवरबर्डन (ओबी) से एम-सैंड बनाने की परिकल्पना की है. ओपनकास्ट माइनिंग के दौरान कोयला निकालने के लिए ऊपर की मिट्टी और चट्टानों को कचरे के रूप में हटा दिया जाता है. साथ ही टूटे चट्टान (ओवरबर्डन) को डंप में फेंक दिया जाता है. अधिकांश कचरे का सतह पर ही निबटान किया जाता है, जो काफी भूमि क्षेत्र घेर लेता है. कोल इंडिया ने खदानों में रेत के उत्पादन के लिए ओवरबर्डन चट्टानों को प्रोसेस करने की परिकल्पना की है. ओबी सामग्री में लगभग 60 प्रतिशत बलुआ पत्थर होता है, जिसके ओवरबर्डन को प्रसंस्करण के जरिये इस्तेमाल किया जा सकता है.
फिलहाल कोल इंडिया की चार परियोजनाओं में एम-सैंड का उत्पादन हो रहा है. इनमें डब्ल्यूसीएल का भानेगांव व गोंडगांव, इसीएल का कजोरा और एनसीएल का अमलोहरी परियोजना शामिल है. डब्ल्यूसीएल के भानेगांव व गोंडगांव परियोजना से उत्पादित एम-सैंड का इस्तेमाल पीएमएवाइ के तहत घरों के निर्माण के लिए नागपुर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट (एनआइटी) को बेचा गया. साथ ही मॉयल को सैंड भंडारण के लिए बेचा गया. इससे दोनों परियोजनाओं को 11.74 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय हुई है.
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प्राकृतिक रेत के उपयोग की तुलना में एम-सैंड का उपयोग करना अधिक सस्ता होगा, क्योंकि इसे कम लागत पर बड़ी मात्रा में उत्पादित किया जा सकता है.
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एम-सैंड एक समान दानेदार आकार का होता है, जो उन निर्माण परियोजनाओं के लिए फायदेमंद होगा, जिनके लिए एक खास तरह के रेत की जरूरत होती है.
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एम-सैंड के इस्तेमाल से निर्माण परियोजनाओं में पानी की खपत को कम करने में मदद मिलेगी, क्योंकि इसे इस्तेमाल से पहले धोने की जरूरत नहीं पड़ती है.
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एम-सैंड रेत अधिक दानेदार होता है और इसकी सतह खुरदरी होती है, जो इसे विशेष तरह की निर्माण परियोजनाओं के लिए अधिक व्यावहारिक बनाती है.
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उत्पादित रेत की व्यावसायिक बिक्री से कोयला कंपनियों को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा. इससे भूमिगत खान भरे जायेंगे, जिससे सुरक्षा और संरक्षण में वृद्धि होगी.
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एम-सैंड उत्पादन से नदी के बालू पर निर्भता कम होगी. इससे नदियों के किनारों का क्षरण कम करने, जलीय इकोसिस्टम व जलस्तर बनाये रखने में मदद मिलेगी.
कंपनी – स्थान – क्षमता
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डब्ल्यूसीएल – बल्लारपुर – 2000
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डब्ल्यूसीएल – दुर्गापुर – 1000
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एसईसीएल – मानिकपुर – 1000
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सीसीएल – कथारा – 500
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बीसीसीएल – बरोरा क्षेत्र – 1000
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इस विधि से ओवरबर्डन का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. सीसीएल में पहले चरण में कथारा से शुरू होगा. इसको आउटसोर्स से चलाया जा सकता है.
– रामबाबू प्रसाद, निदेशक, तकनीकी, सीसीएल
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By Prabhat Khabar News Desk
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