JTET में भोजपुरी-मगही पर रार: मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने खोला मोर्चा, दिया ये तर्क

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JTET Language Dispute

कमेटी में शामिल सदस्य

JTET Language Dispute: झारखंड JTET में भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने पर भाषा कमेटी की सदस्य मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने खुला विरोध दर्ज कराया है. उन्होंने कहा कि पड़ोसी राज्यों की भाषाएं थोपना झारखंड के मूल निवासियों के रोजगार और स्थानीय हितों के साथ समझौता होगा. उन्होंने 13 मार्च 2023 के गजट के आधार पर स्थानीय क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को ही मान्यता देने की मांग की है.

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रांची से अरविंद सिंह की रिपोर्ट

JTET Language Dispute, रांची: झारखंड में आयोजित होने जा रहे शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषा को शामिल करने का मामला गहराता जा रहा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भले ही इस विवाद को दूर करने के लिए वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर के नेतृत्व में कमेटी का गठन कर दिया, लेकिन उस दल में शामिल सदस्यों की राय में ही मतभिन्नता नजर आ रही है. कमेटी में शामिल मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने इसका खुला विरोध किया है. उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि राज्य का गठन बिहार से अलग यहां की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था. पिछले दो दशकों में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों या प्रवासन को आधार बनाकर पड़ोसी राज्यों की भाषाओं (जैसे भोजपुरी, मगही और अंगिका) को JTET में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है. उन्होंने इसके पीछे तर्क दिया कि जब इन भाषाओं को स्वयं बिहार लोक सेवा आयोग की सभी भर्तियों में अनिवार्य या आधिकारिक दर्जा प्राप्त नहीं है, तो इन्हें झारखंड के युवाओं पर थोपना और पात्रता का आधार बनाना राज्य के मूल निवासियों के रोजगार अवसरों और स्थानीय हितों के साथ समझौता करना होगा.

शिक्षक पात्रता परीक्षा सामान्य परीक्षा नहीं: शिल्पी नेहा तिर्की

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) केवल एक सामान्य प्रतियोगी परीक्षा नहीं है, बल्कि यह एक अनिवार्य अर्हता परीक्षा है. यह सुनिश्चित करती है कि शिक्षक स्थानीय बच्चों की भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझकर उन्हें प्रभावी ढंग से शिक्षा दे सकें.

भाषा केवल संवाद नहीं, बल्कि शिक्षण का आधार है

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषा केवल बातचीत का जरिया नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपकरण (Pedagogical Tool) है. उन्होंने वर्ष 1981 में तत्कालीन आयुक्त डॉ. कुमार सुरेश सिंह की अनुशंसा और डॉ. रामदयाल मुंडा द्वारा रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि राज्य की 5 जनजातीय भाषाओं (कुड़ुख, मुंडारी, संथाली, खड़िया, हो) और 4 क्षेत्रीय भाषाओं (खोरठा, कुरमाली, नागपुरी, पंचपरगनिया) को शैक्षणिक व्यवस्था का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए क्योंकि छात्र इन्हीं भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करते आ रहे हैं.

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स्थापित शैक्षणिक सिद्धांत और भाषाई न्याय

दस्तावेजों का हवाला देते हुए मंत्री ने एक स्थापित शैक्षणिक सिद्धांत को रेखांकित किया कि “जिन भाषाओं के माध्यम से विद्यार्थियों का अध्ययन-अध्यापन होता है, शिक्षण एवं संबंधित सेवाओं की पात्रता परीक्षाओं में भी उन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.” इससे पूरी शिक्षा व्यवस्था स्थानीय आवश्यकताओं, सामाजिक वास्तविकताओं एवं विद्यार्थियों की भाषायी पृष्ठभूमि के अनुरूप अधिक प्रभावी, व्यावहारिक और न्यायसंगत बनती है.

शैक्षिक हितों की रक्षा हेतु आवश्यक : मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने यह भी स्पष्ट किया कि “JTET में राज्य की प्रमुख एवं व्यापक रूप से प्रचलित भाषाओं को शामिल करना किसी वर्ग को बाहर करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के शैक्षिक हितों की रक्षा हेतु एक आवश्यक व्यवस्था है.” इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विद्यालयों में नियुक्त होने वाला प्रत्येक शिक्षक छोटे बच्चों से उनकी परिचित भाषा में न्यूनतम स्तर पर संवाद स्थापित करने में पूर्णतः सक्षम हो.

वर्ष 2023 के गजट के आधार पर हो भाषा का निर्धारण

श्रीमती शिल्पी नेहा तिर्की ने सरकार और भाषा कमेटी से पुरजोर मांग की है कि JTET में भाषा संबंधी नीति का निर्धारण कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग द्वारा 13 मार्च 2023 को अधिसूचित राजपत्र (गजट संख्या 147/148) के आधार पर ही किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि स्पष्ट स्थानीय नीति के अभाव में परीक्षा का पाठ्यक्रम और भाषा ही स्थानीय युवाओं को अवसर देने का एकमात्र माध्यम हैं. अतः राज्य के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और स्थानीय प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए केवल यहां की अधिसूचित क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं को ही परीक्षा में अधिमानता दी जाए.

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समीर उरांव

लेखक के बारे में

By समीर उरांव

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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