60 करोड़ का हाईटेक स्काडा सिस्टम बना कबाड़, डेढ़ साल से ठप है बिजली की ऑनलाइन निगरानी

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रांची SCADA सिस्टम कबाड़: बिजली निगरानी ठप, उपभोक्ता परेशान

स्काडा सिस्टम चालू रहने पर सभी सबस्टेशनों और फीडरों की रीयल-टाइम जानकारी बड़ी स्क्रीन पर दिखती थी, जो पिछले डेढ़ साल से बंद पड़ी है.

रांची, जमशेदपुर और धनबाद का करोड़ों का SCADA सिस्टम कबाड़ बन चुका है. 24 घंटे की बिजली आपूर्ति की ऑनलाइन निगरानी ठप हो गई है. जानिए इस बड़ी लापरवाही के पीछे की वजह और आम उपभोक्ता कैसे परेशान हो रहे हैं.

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Jharkhand SCADA System Failure : पांच साल पहले रांची, जमशेदपुर और धनबाद में करीब 60 करोड़ रुपये (हर शहर में 20-20 करोड़ रुपये) खर्च कर लगाया गया हाइटेक सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन (स्काडा) सिस्टम अब कबाड़ बन चुका है. यह वही सिस्टम है, जिससे शहरों की बिजली आपूर्ति की 24 घंटे ऑनलाइन, रीयल‑टाइम निगरानी की जाती थी. साथ ही फॉल्ट आते ही मिनटों में मरम्मत कर बिजली आपूर्ति बहाल कर दी जाती थी. करार खत्म होते ही सिस्टम लगाने, डेटा प्रदान करने और नेटवर्क का मेंटेनेंस करनेवाली एजेंसियां चली गयीं. झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड(जेबीवीएनएल) के आला अधिकारियों को समस्या मालूम थी, लेकिन खर्च कम करने और पैसे बचाने के चक्कर में संबंधित फाइल लंबे समय तक विभाग की आलमारी में पड़ी रही. न तो पुरानी एजेंसियों के साथ नया करार किया गया, न ही तुरंत टेंडर निकाला गया. नतीजा सामने है- कंट्रोल रूम की बड़ी एलइडी स्क्रीनें करीब डेढ़ साल से बंद पड़ी हैं, ऑनलाइन मॉनिटरिंग ठप है और बिजली फॉल्ट को मैनुअली ढूंढ़कर ठीक किया जा रहा है, जिसमें समय लग रहा है. इससे आम उपभोक्ता परेशान हैं.

क्या है स्काडा सिस्टम?

  • यह एक अत्याधुनिक केंद्रीयकृत निगरानी प्रणाली है, जो सब-स्टेशनों और फीडरों को स्वचालित रूप से नियंत्रित करती है.
  • कंट्रोल रूम से फीडर के लोड पर सीधी नजर रखी जाती है, जिससे गुणवत्तापूर्ण निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित होती है.
  • ओवरलोड/फॉल्ट की समस्या और जगह का तुरंत पता लगता है, टेक्नीशियन तत्काल मौके पर पहुंच कर मरम्मत करते हैं.

2019 में हुई शुरुआत, 2020 से पूरी तरह हुआ लागू

रिस्ट्रेक्टेड एक्सीलरेटेड पावर डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म्स प्रोग्राम (आरएपीडीआरपी) के तहत चीन की कंपनी डोंगफेंग इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ अनुबंध कर वर्ष 2019-20 में तीन बड़े शहरों में स्काडा सिस्टम स्थापित किया गया था. राजधानी में स्काडा का कंट्रोल रूम डोरंडा स्थित कुसई कॉलोनी में बनाया गया था. 15 अगस्त 2019 को पूरे तामझाम के साथ इसकी शुरुआत की गयी. वहीं, सभी परीक्षणों के पूरा होने के बाद इसे अंततः पूरी क्षमता के साथ 2020 से प्रभावी रूप से चालू कर दिया गया.

स्काडा कंट्रोल रूम के जरिये राजधानी रांची के 33/11 केवी के 44, धनबाद के 20 और जमशेदपुर के 22 पावर सबस्टेशन और उनसे संबंधित फीडरों को नियंत्रित किया जा रहा था. राजधानी में स्काडा सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर मॉडर्न इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किये गये थे. कई 33/11 केवी पावर सबस्टेशनों को अपग्रेड किया गया था. साथ ही वहां नयेट्रांसफार्मर और अत्याधुनिक उपकरण लगाये गये थे.

33/11 केवी कोकर रूलर सबस्टेशन (जब सिस्टम स्थापित (फंक्शनल) किया गया था. तत्कालीन जूनियर इंजीनियर आकाश प्रताप सिंह सर्विस स्टेशन का मॉनिटरिंग करते हुए.
33/11 केवी कोकर रूलर सबस्टेशन (जब सिस्टम स्थापित (फंक्शनल) किया गया था. तत्कालीन जूनियर इंजीनियर आकाश प्रताप सिंह सर्विस स्टेशन का मॉनिटरिंग करते हुए.

सटीक जानकारी, तुरंत मरम्मत और बिजली बहाल

स्काडा सिस्टम का फायदा यह था कि कहीं भी लाइन में फॉल्ट ढ़ूंढ़ने के लिए विभाग की टीम को लंबी पेट्रोलिंग नहीं करनी पड़ती थी. फॉल्ट आने पर कंट्रोल रूम में बैठे अधिकारियों को यहां लगी बड़ी एलइडी सक्रीन पर संबंधित जगह की सटीक जानकारी मिल जाती थी. तुरंत इसकी सूचना कनीय या सहायक विद्युत अभियंता को दी जाती थी और विभाग की टीम मिनटों में ही फॉल्ट की मरम्मत कर बिजली बहाल कर देती थी. वहीं, सबस्टेशनों के मॉनिटर रूम में निगरानी के लिए हर वक्त कंप्यूटर मॉनीटर के सामने दो लोग मौजूद रहते थे. स्काडा सिस्टम का दूसरा फायदा यह भी था कि अगर किसी फीडर में खराबी आती थी, तो इसकी सूचना फौरन कंट्रोल रूम को चल जाती थी और सिस्टम पर बने सबस्टेशन का कॉलम ग्रीन की जगह रेड हो जाता था. सेक्सनाइजर और अन्य उपकरणों के जरिये संबंधित इलाके में दूसरेफीडर सेबिजली की सप्लाई तुरंत बहाल कर दी जाती थी.

ऐसे ध्वस्त होती चली गयी पूरी निगरानी व्यवस्था

स्काडा सिस्टम के संचालन और रखरखाव के लिए डोंगफेंग इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ पांच वर्षों का करार हुआ था. कंपनी वर्ष 2024 में ही जानकारी दे दी कि ‘सिफी टेक्नोलॉजीज’ ने डेटा लिंक उपलब्ध कराना बंद कर दिया है. एमआरटी (मीटर टेस्टिंग एंड रीले डिपार्टमेंट) की ओर से पत्र के माध्यम से इसकी जानकारी विभाग के आला अधिकारियों दे दी गयी. लेकिन, इस पर ध्यान नहीं दिया गया. नतीजतन, समय के साथ सब स्टेशनों के अंदर लगाये डेस्कटॉप कंप्यूटर के लिंक फेल हो गये और कनेक्टिविटी चौपट हो गयी. इधर, अक्तूबर 2025 में जीएम आइटी को सूचित किया कि रांची, धनबाद और जमशेदपुर में स्काडा सिस्टम का रखरखाव करनेवाली एजेंसी की सेवा अवधि पूरी हो रही है. इस पर भी विभाग ने गंभीरता नहीं दिखायी. अंतत: 31 दिसंबर 2025 को एजेंसी ने अपनी सेवाएं पूरी तरह सेबंद कर दीं. इसके बाद जरूरी रखरखाव के अभाव में महत्वपूर्ण उपकरण खराब होते चले गए और समय के साथ पूरा सिस्टम ध्वस्त हो गया.

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यह अब का, उसी जगह कोकर रूलर सबस्टेशन की तस्वीर जब सिस्टम फेल कर गया. (तब और अब)

इनके साथ पांच वर्षों के लिए हुआ था करार

डोंगफेंग इलेक्ट्रॉनिक्स

चीन की इस कंपनी से मुख्य अनुबंध हुआ था. इसे ही तीनों शहरों में कंट्रोल रूम बनाने और संचालन का जिम्मा मिला था. कंपनी का शुरुआती प्रपोजल 65 करोड़ का था, जबकि डील 56 करोड़ में फाइनल हुई.

सिफी टेक्नोलॉजीज

यह कंपनी स्काडा सिस्टम को डिजिटल लिंक उपलब्ध करा रही थी, जिसके जरिये बिजली सबस्टेशनों से आपूर्ति संबंधी जानकारी कंट्रोल रूम तक पहुंचती थी और वहां से रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव हो पाता था.

डेल्टा इलेक्ट्रॉनक्सि

यह कंपनी स्काडा सिस्टम को मुख्य स्क्रीन डिस्प्ले को टेक्निकल सपोर्ट मुहैया कराती थी. साथ ही सॉफ्टवेयर सपोर्ट/अपडेट और मेंटेनेंस से जड़ेु काम देखती थी, जिससे बिजली आपूर्ति की रीयल‑टाइम मॉनिटरिंग सुचारू हो पाती थी.

जीएम आइटी संजय कुमार से सीधी बात

सवाल : क्या एजेंसी के अनुबंध खत्म होने और सिस्टम ध्वस्त होने की जानकारी अधिकारियों को थी?

जवाब : डाटा नेटवर्क के लिए दिसंबर 2024 तक का और स्काडा सिस्टम ऑपरेशन के लिए दिसंबर 2025 तक का करार हुआ था. जब नेटवर्क कनेक्टिविटी ठप हुई, तो डेल्टा इलेक्ट्रॉनक्सि ने कोटेशन भेजा था, लेकिन खर्च ज्यादा बताये जाने की वजह से प्रपोजल विभाग में ही पड़ा रहा. 17 अक्तूबर 2025 और तीन दिसंबर 2025 को भी विभाग को रिमाइंडर भेजा गया था. दिसंबर 2025 और जनवरी-फरवरी में भी रिमाइंडर भेजा गया था. 14 मार्च को एक पत्र के जरिये विभाग को विस्तार से जानकारी दी गयी थी.

सवाल: एजेंसी के काम छोड़ने पर सिस्टम चालू रखने के लिए विभाग/एमआरटी ने क्या कदम उठाये?

जवाब : यह पूरा मामला मेरे कार्यभार संभालने से पहले का है. जहां तक मुझे जानकारी है, सिस्टम का मेंटेनेंस जारी रखने के लिए तीनों एजेंसियों को पत्र लिखा गया, लेकिन हर बार एजेंसियों ने ऊंची दर बतायी. ऐसे में टेंडर में जाने का निर्णय लिया गया, हालांकि वह भी सिंगल बिड हो गया. अब सिस्टम को नये सिरे से शुरू करने में छह से आठ महीने का वक्त लग सकता है.

सवाल : वर्तमान में कितने सब स्टेशन और कितने फीडर रिमोट मॉनिटरिंग से कटे हुए हैं?

जवाब : अभी ऑनलाइन निगरानी का कोई सिस्टम मौजूद नहीं है. मौजूदा समय में स्काडा कंट्रोल रूम को फोन पर सूचनाएं मिल रही हैं, जिसे अनौपचारिक रूप से आगे बढ़ा दिया जा रहा.

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Priya Gupta

लेखक के बारे में

By Priya Gupta

प्रिया गुप्ता पिछले एक वर्ष से प्रभात खबर में जूनियर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. फिलहाल वह झारखंड से जुड़ी खबरों पर काम करती हैं, जिनमें सरकारी योजनाएं, प्रमुख घटनाएं, सामाजिक मुद्दे और अन्य महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं. इससे पहले वह लाइफस्टाइल डेस्क पर फैशन, हेल्थ, रिलेशनशिप, पैरेंटिंग और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं. प्रिया ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से स्नातक और अमिटी यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की है.

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