आईटीबीपी अधिकारी को झारखंड हाईकोर्ट से राहत, एसीआर विवाद में आदेश रद्द

झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने आईटीबीपी के मेडिकल अधिकारी की प्रतिकूल एसीआर से जुड़े मामले में 2017 का आदेश रद्द कर दिया. अदालत ने निष्पक्ष और कारणयुक्त समीक्षा करते हुए 16 सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश आईटीबीपी के महानिदेशक को दिया.
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के एक मेडिकल अधिकारी की प्रतिकूल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) और पदोन्नति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने वर्ष 2017 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अधिकारी की अपील खारिज कर दी गई थी. अदालत ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी ने पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं किया और बिना सभी तथ्यों पर विचार किए यांत्रिक तरीके से निर्णय दे दिया.
पदोन्नति पर पड़ा था प्रतिकूल एसीआर का असर
याचिकाकर्ता डॉ बिनोद कुमार सिंह वर्ष 2003 में आईटीबीपी में मेडिकल ऑफिसर (असिस्टेंट कमांडेंट) के पद पर नियुक्त हुए थे. वर्ष 2005 के दौरान उनकी एसीआर में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की गई. उनका आरोप था कि तत्कालीन कमांडेंट ईश्वर सिंह दुहान ने निजी दुर्भावना के कारण यह प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज कराई, क्योंकि उन्होंने कथित अनियमितताओं में सहयोग करने से इनकार कर दिया था और इसकी शिकायत भी की थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि इसी प्रतिकूल एसीआर के कारण वर्ष 2007 में उन्हें समय पर सीनियर मेडिकल ऑफिसर के पद पर पदोन्नति नहीं मिल सकी, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को प्रमोशन मिल गया.
पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था मामला
प्रतिकूल एसीआर के खिलाफ डॉ. सिंह ने पहले भी झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. वर्ष 2017 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए अपील खारिज करने वाले पुराने आदेश को रद्द कर मामले को दोबारा विचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा था. अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता की सभी आपत्तियों और तर्कों पर विचार कर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए. हालांकि, दोबारा सुनवाई के बाद भी 7 नवंबर 2017 को उनकी अपील फिर खारिज कर दी गई. इसके बाद उन्होंने एक बार फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
कोर्ट ने बताया गैर-कारणयुक्त आदेश
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभाग ने नए आदेश में भी याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए प्रमुख बिंदुओं पर विचार नहीं किया. अदालत ने कहा कि आदेश में केवल रिपोर्टिंग अधिकारी के दावों और उनके जवाब को दोहराया गया है, जबकि याचिकाकर्ता के विस्तृत प्रतिवेदन पर कोई स्वतंत्र विश्लेषण नहीं किया गया. अदालत ने टिप्पणी की कि यह किसी भी दृष्टि से "स्पीकिंग ऑर्डर" या कारणयुक्त आदेश नहीं माना जा सकता.
पक्षपात के आरोपों को भी माना अहम
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस तथ्य का भी उल्लेख किया कि रिपोर्टिंग अधिकारी ईश्वर सिंह दुहान के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में भी एक अन्य मामले में पक्षपातपूर्ण एसीआर देने के आरोप लगे थे. उस मामले में भी अदालत ने रिकॉर्ड की दोबारा समीक्षा कर नई एसीआर तैयार करने का निर्देश दिया था. झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी अधिकारी पर पहले से पक्षपात के आरोप रहे हों, तब उसी अधिकारी की टिप्पणियों को दोबारा निर्णय का आधार बनाना निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जा सकता.
निष्पक्ष समीक्षा का निर्देश
अदालत ने कहा कि मामले की दोबारा समीक्षा पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए. यदि संभव हो तो उस अवधि के किसी अन्य पर्यवेक्षण अधिकारी या समकालीन कमांडेंट से संबंधित रिकॉर्ड की समीक्षा कराई जाए, ताकि निर्णय पर किसी प्रकार के पक्षपात की आशंका न रहे.
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16 सप्ताह में नया आदेश देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2017 के आदेश को रद्द करते हुए आईटीबीपी के महानिदेशक को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की 21 मार्च 2007 की अपील में उठाए गए सभी बिंदुओं पर विस्तार से विचार कर नया, कारणयुक्त और निष्पक्ष आदेश पारित किया जाए. अदालत ने यह पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने के 16 सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही याचिका स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया.
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By कुमार विश्वत सेन
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