झारखंड हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग का आदेश किया रद्द, बिना ठोस कारण के ठुकरा दिया गया था कर्मचारी का दावा

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कोर्ट हैमर.

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग का 2021 का आदेश रद्द करते हुए सेवानिवृत्त कर्मचारी काशीनाथ गांगुली के वेतनमान विवाद पर 12 सप्ताह में नया कारणयुक्त आदेश देने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि बिना ठोस कारण और तथ्यों पर विचार किए दावा खारिज करना न्यायसंगत नहीं है.

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Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के वेतनमान से जुड़े मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है. न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने वर्ष 2021 में पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सेवानिवृत्त सुपरवाइजर (मैकेनिकल) काशीनाथ गांगुली के संशोधित वेतनमान के दावे को खारिज कर दिया गया था. अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारी ने बिना उचित कारण और तथ्यों पर विचार किए केवल पुराने विभागीय पत्र का हवाला देकर दावा अस्वीकार कर दिया, जो कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता.

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1984 में हुई थी नियुक्ति

याचिकाकर्ता काशीनाथ गांगुली ने वर्ष 1984 में रांची स्थित सरकारी बेकन फैक्ट्री में सुपरवाइजर (मैकेनिकल) के रूप में सेवा शुरू की थी. वर्ष 1994 में उन्हें प्रथम टाइम बाउंड प्रोन्नति मिली और बाद में उनका वेतनमान 5000-8000 रुपये निर्धारित किया गया. वित्त विभाग के वर्ष 2005 के संकल्प के बाद प्रथम और द्वितीय वित्तीय उन्नयन के तहत क्रमशः 6500-10500 और 10000-15200 रुपये के वेतनमान का प्रावधान किया गया. इसके आधार पर वर्ष 2006 में उनका वेतनमान 6500-10500 रुपये कर दिया गया.

बाद में घटा दिया गया वेतनमान

कुछ समय बाद 16 अक्टूबर 2007 को महाप्रबंधक ने आदेश जारी कर उनका वेतनमान घटाकर 5500-9000 रुपये कर दिया. साथ ही अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली का भी निर्देश दिया गया. इसके खिलाफ काशीनाथ गांगुली ने हाईकोर्ट का रुख किया था. पहले एकलपीठ ने उनके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन बाद में एलपीए (एलपीए नंबर. 397/2018) में डिवीजन बेंच ने उस आदेश के एक हिस्से को निरस्त करते हुए मामले को सक्षम प्राधिकारी के पास दोबारा सुनवाई के लिए भेज दिया.

फिर भी नहीं सुनी गई आपत्ति

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद याचिकाकर्ता ने 12 फरवरी 2021 को विस्तृत अभ्यावेदन देकर संशोधित अधिसूचना 5 फरवरी 2007 का हवाला दिया. उनका कहना था कि 14 अगस्त 2002 की अधिसूचना का वह प्रावधान, जिसके आधार पर उनका वेतनमान घटाया गया था, संशोधित अधिसूचना से समाप्त हो चुका है. इसलिए उन्हें 6500-10500 रुपये का वेतनमान मिलना चाहिए. हालांकि, विभाग ने 4 मार्च 2021 को उनका दावा फिर से खारिज कर दिया. आदेश में केवल यह कहा गया कि 3 अक्टूबर 2007 के विभागीय निर्देश का पालन किया जाएगा और उसमें किसी प्रकार का संशोधन संबंधित अधिकारी के स्तर पर संभव नहीं है.

हाईकोर्ट ने आदेश को बताया गैर-कारणयुक्त

हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय अधिकारी ने याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन में उठाए गए किसी भी कानूनी या तथ्यात्मक बिंदु पर विचार नहीं किया. केवल पुराने पत्र का हवाला देकर दावा खारिज कर देना न्यायसंगत निर्णय नहीं माना जा सकता. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी ने पहले से ही याचिका खारिज करने का मन बना लिया था और बिना स्वतंत्र विचार के यांत्रिक तरीके से आदेश पारित कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के क्रांति एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान (2010) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक प्रशासनिक या न्यायिक निर्णय स्पष्ट, तार्किक और कारणयुक्त होना चाहिए. केवल औपचारिक या रबर स्टांप जैसे कारणों के आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता.

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12 सप्ताह में नया आदेश देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने 4 मार्च 2021 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सक्षम प्राधिकारी के पास भेज दिया है. अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के 12 फरवरी 2021 के अभ्यावेदन में उठाए गए सभी बिंदुओं पर विधि के अनुरूप विचार कर 12 सप्ताह के भीतर कारणयुक्त और स्पष्ट आदेश पारित किया जाए. इसी निर्देश के साथ अदालत ने याचिका का आंशिक रूप से निस्तारण कर दिया.

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