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मुंडा संस्कृति के केंद्र में रची गयी है इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका

Updated at : 28 May 2024 11:53 PM (IST)
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मुंडा संस्कृति के केंद्र में रची गयी है इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका

डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान मोरहाबादी में इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका का हिंदी में अनुवाद कार्य चल रहा है

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रांची. पिछले कुछ महीनों से डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान मोरहाबादी में जर्मन जेसुइट फादर हॉफमैन रचित इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका (बृहद शब्दकोश) का हिंदी में अनुवाद कार्य चल रहा है. इस कार्य में गुंजल इकिर मुंडा (पद्मश्री स्व रामदयाल मुंडा के पुत्र) सहित कई लोग जुटे हैं. गुंजल ने बताया कि यह काफी श्रमसाध्य और लंबा चलनेवाला कार्य है. इसकी वजह है कि यह इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका करीब 5000 पेजों की है और 16 वॉल्यूम में है. मुंडा भाषा और संस्कृति को लेकर किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया यह शायद सबसे बड़ा काम है. यह पुस्तक सिर्फ शब्दकोश नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में मुंडा संस्कृति और जीवन समाहित हैं.

5000 पेजों का है वृहद ग्रंथ

यह हैरत की बात है कि एक विदेशी पादरी भारत आता है और झारखंड के मुंडा आदिवासियों के क्षेत्र को अपना कार्यस्थल बनाता है. वह ना सिर्फ मुंडा क्षेत्र में सालों तक रहता है, बल्कि उनकी भाषा, सामाजिक रीति-रिवाज और संस्कृति को सीखता व समझता है और फिर 5000 पेजों का ऐसा ग्रंथ रच देता है, जो मुंडा भाषा-संस्कृति पर काम करनेवाले लोगों के लिए एक आधार ग्रंथ की तरह है. इसमें ऐसे पुराने शब्द मिलते हैं, जो आजकल प्रचलन से गायब हो गये हैं. गुंजल बताते हैं कि इस अनुवाद कार्य के दौरान उन्हें फादर हॉफमैन के विचारों और शख्सियत को भी करीब से समझने में मदद मिली. उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि फॉदर यहां के आदिवासियों के प्रति सहानुभूति रखते थे. वे जेसुइट फादर थे, लेकिन कई जगह पर वह चर्च के लोगों की भी आलोचना करते दिखते हैं. गुंजल ने कहा कि यहां मिलने पर झुककर जोहार करने की परंपरा रही है, लेकिन मिशनरियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में हाथ मिलाने का प्रचलन शुरू हुआ. फादर का मानना था कि अभिवादन का यह तरीका आदिवासी संस्कृति के अनुरूप नहीं है.

फादर की बिरसा आंदोलन पर भी थी नजर

गुंजल ने बताया कि फादर ने उस समय जमींदारों द्वारा आदिवासियों पर किये जा रहे अत्याचारों और जमीन हड़पने के कारण उत्पन्न असंतोष को बयां किया है. बिरसा आंदोलन और सामाजिक उथल-पुथल पर भी उनकी नजर रही थी. हालांकि अंग्रेजों के साथ उनके सॉफ्ट कॉर्नर की भी झलक मिलती है. गुंजल इसका कारण बताते हैं कि चूंकि उस समय अंग्रेजी शासन था और वह आदिवासी क्षेत्रों के अनुरूप कानून बनवाना चाहते थे. हालांकि इसके बाद भी प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद फादर हॉफमैन को वापस जर्मनी लौटना पड़ा. उन्होंने इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका के शेष कार्यों को वहीं रहकर पूरा किया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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