रांची के इस मंदिर में बेहद अनोखा है नवरात्र में पूजा करने का तरीका, 300 साल पुराना है इतिहास

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 19 Oct 2023 9:09 AM

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शाहदेव राजपरिवार के वंशज ठाकुरगांव निवासी जयकुमार नाथ शाहदेव के अनुसार, इस मंदिर में साक्षात मां भवानी विराजमान हैं. नवरात्र में मंदिर में माता की अलग से कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है.

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कालीचरण साहू, रांची: ठाकुरगांव के भवानी-शंकर मंदिर का इतिहास 300 साल पुराना है. इस मंदिर में स्थापित अष्टधातु से निर्मित ‘भवानी-शंकर’ की युगल प्रतिमाओं के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए वर्जित है. नवरात्र जैसे विशेष अवसरों पर केवल मंदिर के पुजारी और शाहदेव राजपरिवार के सदस्य ही मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं, जबकि अन्य भक्त चुनरी, पुष्प, प्रसाद पुरोहित को सौंप कर मंदिर के आंगन में बैठ जाते हैं और वहीं माता की स्तुति करते हैं.

शाहदेव राजपरिवार के वंशज ठाकुरगांव निवासी जयकुमार नाथ शाहदेव के अनुसार, इस मंदिर में साक्षात मां भवानी विराजमान हैं. नवरात्र में मंदिर में माता की अलग से कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है. वहीं, माता की पूजा भी गोपनीय तरीके से की जाती है. इस दौरान पुजारी आंखों पर पट्टी बांध कर भवानी-शंकर की प्रतिमा को स्नान कराते हैं और वस्त्र बदलते हैं. अष्टमी को संधि बलि होती है. नवमी के दिन बकरों के साथ एक काड़ा (भैंसे) की बलि देने की प्रथा है. नवमी और विजयादशमी को मेला लगता है.

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चेतनाथ बाबा ने राजपरिवार को दी थी प्रतिमा

इस मंदिर के निर्माण की कहानी रोचक है. वर्ष 1543 में नवरत्न गढ़ के महाराज रघुनाथ शाहदेव के पुत्र यदुनाथ शाहदेव की बारात बक्सर जा रही थी. इसी दौरान जिस नदी किनारे बारात ने पड़ाव डाला, वहां युवराज की तबीयत बिगड़ गयी. आसपास के ग्रामीणों ने महाराज को चेतनाथ बाबा के पास जाने की सलाह दी. चेतनाथ बाबा ने अपने मंत्र से युवराज को स्वस्थ कर दिया.

इसके बाद उन्हें बहुमूल्य चिंतामणि और भवानी-शंकर की प्रतिमाएं दीं. कालांतर में युवराज यदुनाथ शाहदेव के पुत्र कुंवर गोकुल नाथ शाहदेव भवानी-शंकर और चिंतामणि की प्रतिमाओं की पूजा करने लगे. बाद में गोकुल नाथ शाहदेव के पुत्र कमलनाथ शाहदेव भवानी-शंकर की प्रतिमाओं को लेकर गिंजो लाट चले आये. इसी कारण इस स्थान का नाम गिंजो ठाकुरगांव पड़ा. चिंतामणि की प्रतिमा रातू महाराज को बंटवारे में मिली थी.

मूर्ति की हुई थी चोरी, पटना हाइकोर्ट तक गया था मामला

बताया जाता है कि 19 अक्तूबर 1965 की रात मंदिर से बहुमूल्य भवानी-शंकर की प्रतिमाएं चोरी हो गयी थीं. ये प्रतिमाएं सड़क निर्माण के दौरान वर्ष 1991 में रातू स्थित एतवार बाजारटांड़ के पास से मिली थी. ग्रामीणों ने मूर्ति को आमटांड़ स्थित शिव मंदिर में स्थापित कर दिया. इसकी जानकारी मिलने पर ठाकुरगांव के लोगों ने मूर्ति पर दावा पेश किया, लेकिन रातू के लोगों ने इसे देने से इनकार कर दिया.

मामला अदालत पहुंचा, जिसमें फैसला ठाकुरगांववासियों के पक्ष में हुआ. इसके विरोध में पटना उच्च न्यायालय में मामला दर्ज कराया गया. 13 फरवरी, 1992 को पटना उच्च न्यायालय की रांची बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए ठाकुरगांव के पक्ष में फैसला सुनाया. इसके बाद हजारों की संख्या में ग्रामीण गाजे बाजे के साथ पैदल रातू पहुंचे और भवानी-शंकर की प्रतिमाओं को लेकर मंदिर में पहुंचे और दोबारा वहां स्थापित कर दिया. वर्तमान में शाहदेव परिवार ही इन युगल प्रतिमाओं की देखरेख कर रहे हैं.

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