इलेक्ट्रॉनिक चाक ने बदली झारखंड के कुम्हारों की जिंदगी, बीते 3 माह से मिट्टी के दीये और बर्तन कर रहे तैयार
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 08 Nov 2023 1:10 PM
माटी कला बोर्ड का महत्वपूर्ण एमडी और चेयरमैन का पद खाली है. माटी कला बोर्ड के सदस्य अविनाश देव ने बताया कि बोर्ड का गठन 2017 को किया गया था. तीन वर्ष के कार्यकाल के बाद 30 मई 2020 को चेयरमैन सेवानिवृत्त हो गये
रांची: दीपावली का त्योहार मिट्टी के कलाकारों यानी कुम्हारों के लिए विशेष मौका है. इस त्योहारी मौसम में कुम्हार अपने एक वर्ष का रोजगार और पारंपरिक पेशा की पूंजी जुटाते हैं. पारंपरिक नियम के तहत इस्तेमाल होनेवाले मिट्टी के दीये व बर्तन की मांग इस समय बढ़ गयी है. पुरानी रांची, डुमरदगा, खूंटी, बुंडू, अनगड़ा और खलारी समेत अन्य इलाकों में रह रहे कुम्हार बीते तीन माह से इसकी तैयारी में जुटे नजर आ रहे हैं. कुम्हारों के घर का आंगन इन दिनों मिट्टी के दीयों, खिलौनों और अन्य आकर्षक सामग्रियों से भरे नजर आ रहे हैं. वहीं, पूरा परिवार एकजुट होकर मिट्टी के बर्तनों के रंग-रोगन में शामिल हो गया है. इधर, समय के साथ कई कुम्हार पारंपरिक पद्धति को छोड़कर आधुनिक उपकरण अपना चुके हैं. पेश है रिपोर्ट….
माटी कला बोर्ड का महत्वपूर्ण एमडी और चेयरमैन का पद खाली है. माटी कला बोर्ड के सदस्य अविनाश देव ने बताया कि बोर्ड का गठन 2017 को किया गया था. तीन वर्ष के कार्यकाल के बाद 30 मई 2020 को चेयरमैन सेवानिवृत्त हो गये. इसके बाद से पद पर नियुक्ति नहीं हुई. वहीं, छह माह पूर्व एमडी का कार्यकाल भी समाप्त हो गया. इसके बाद से बोर्ड का गठन नहीं हो सका है. जो कुम्हार पारंपरिक तौर-तरीके से काम कर रहे हैं, वह इससे प्रभावित हो रहे है. समय पर टेंडर पूरा नहीं होने से राज्य के 30 लाख कुम्हार उपेक्षित हैं. कुम्हारों के बीच इलेक्ट्रॉनिक चाक का वितरण और प्रशिक्षण नहीं मिलने से नये प्रयोग नहीं हो रहे हैं. बोर्ड के तहत हर जिले व प्रखंड में कुम्हारों के लिए प्रशिक्षण केंद्र संचालित होने से कुम्हारों की जीविका में बदलाव लाया जा सकेगा. साथ ही बाजार उपलब्ध हो सकेंगे.
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खुर्जा उत्तर प्रदेश से चलकर रांची में मिट्टी के बर्तन पहुंच चुके हैं. आकर्षक दिखने वाले मिट्टी के बर्तन व मूर्तियां सिरेमिक मिट्टी से तैयार हो रहे हैं. सिरेमिक में टाइल, ग्लेज, जिरकोनियम ऑक्साइड और सिलिका का इस्तेमाल होता है. इससे बर्तन के खांचे पर ढाल कर तैयार करना आसान है.
रांची शहर में मिलनेवाले मिट्टी के दीये व बर्तन स्थानीय नगड़ा मिट्टी से तैयार हो रहे हैं. यह नगड़ा मिट्टी जुमार नदी के तट से निकाली जाती है. इसके अलावा खूंटी और अनगड़ा से भी मिट्टी की जरूरत पूरी की जा रही है. कुम्हार शंकर प्रजापति ने बताया कि नदी के तट से मंगायी जाने वाली मिट्टी से ही दीया, ग्वालिन और छोटे से बड़े आकार की मटकी व प्याला तैयार की जाती है. मिट्टी की खासियत है कि इसकी पकड़ मजबूत होती है, जिससे बर्तन टूटते नहीं हैं. वहीं, आसपास के जिलों से चिकनी मिट्टी ऑर्डर के अनुरूप मंगाये जाते हैं. इससे मिट्टी के खिलौने, बर्तन और मूर्तियां तैयार हो रहे हैं. चिकनी मिट्टी को मंगाने का खर्च बढ़ गया है. प्रति ट्रैक्टर 1800 रुपये की लागत से इसकी आपूर्ति हो रही है.
शहर के कुम्हार अब पारंपरिक लकड़ी से बने चाक को छोड़ कर इलेक्ट्रॉनिक चाक को अपना चुके हैं. इससे काम की शैली बदली है. पहले जहां एक मध्यम आकार के दीया का सैकड़ा तैयार करने में तीन घंटे से अधिक का समय लगता था, वहीं अब इलेक्ट्रिक चाक होने से सवा घंटे में 100 दीये तैयार हो जा रहे हैं. इससे कुम्हार अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सफल हुए हैं. वहीं, समय पर निश्चित उत्पादन पूरा होने से बाजार तक सामग्रियों को पहुंचाया जा रहा है. इलेक्ट्रिक चाक के दो मॉडल हैं, जिसमें एक बिजली और दूसरा सोलर से चलने वाला है.
दीया : एक रुपया प्रति पीस
छोटा दीया : 80 रुपये सैकड़ा
11 दीया वाली ग्वालिन : ~100
पांच दीया वाली ग्वालिन : ~80
मिट्टी के खिलौने : हाथी, घोड़ा, गाय व शेर :20-20 रुपये प्रति पीस
मिट्टी के बर्तन खिलौने : चूल्हा, चाक और बेलना, कप, प्लेट, जग व बाल्टी : ~10-10 प्रति पीस
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