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कोरोना के बाद झारखंड के सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति हुई कम, कई विद्यालय पारा शिक्षक के भरोसे

Updated at : 20 Dec 2022 8:55 AM (IST)
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कोरोना के बाद झारखंड के सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति हुई कम, कई विद्यालय पारा शिक्षक के भरोसे

छात्रों की हाजिरी प्रा विद्यालयों में केवल 68 फीसदी है. माध्यमिक स्कूलों में 58 फीसदी. स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन हो रहा है. इनमें से 90 फीसदी दलित व आदिवासी बच्चे अध्ययनरत हैं.

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Jharkhand News: झारखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन नहीं हो रहा. शिक्षकों की कमी है. इसका खामियाजा दलित व आदिवासी बच्चे भुगत रहे हैं. कोरोना काल के बाद सरकारी स्कूल में बच्चों की उपस्थिति में गिरावट आयी है. बच्चे लिखना-पढ़ना भूल गये हैं. ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड के ‘विद्यालय सर्वेक्षण-2022’ की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. ‘स्कूल में भूल’ नामक इस सर्वे में पाया गया कि झारखंड की स्कूली शिक्षा संकट में है. एक तिहाई प्राथमिक विद्यालयों में एक ही अध्यापक हैं.

छात्रों की हाजिरी प्रा विद्यालयों में केवल 68 फीसदी है. माध्यमिक स्कूलों में 58 फीसदी. स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन हो रहा है. एक्सआइएसएस सभागार में समिति के राष्ट्रीय महासचिव काशीनाथ चटर्जी ने बताया कि सितंबर से अक्तूबर तक राज्य के 16 जिलों के 26 प्रखंडों में संचालित 138 प्राथमिक व माध्यमिक स्कूलों में यह सर्वेक्षण किया गया.

इनमें से 90 फीसदी दलित व आदिवासी बच्चे अध्ययनरत हैं. समिति ने सरकार से समय रहते शिक्षा प्रणाली दुरुस्त करने की मांग की है. व्यवस्था में सुधार न करने पर 23 मार्च, 2023 से समिति सर्वेक्षण किये गये जिलाें में प्रखंड स्तर पर अभियान चला कर आरटीइ को पूर्ण रूप से लागू करने के की मांग को लेकर धरना देगी. सर्वेक्षण रिपोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने पेश की.

सर्वे की खास बातें

सर्वेक्षण के सैंपल के चयनित 138 स्कूलों में से 20% में एक ही शिक्षक थे. ज्यादातर स्कूलों में एकमात्र पुरुष पारा शिक्षक मिले.

प्राथमिक विद्यालयों में 55% व माध्यमिक विद्यालयों में 37% पारा शिक्षक हैं. 40% स्कूल पारा शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं.

हर तीन स्कूलों में से एक में ट्रेंड शिक्षक हैं. नामांकित बच्चों के मुकाबले प्राथमिक में 68 व माध्यमिक वि में 58% विद्यार्थी पहुंच रहे हैं.

सर्वेक्षण में चिह्नित किसी भी विद्यालय में शौचालय, बिजली व पानी की व्यवस्था नहीं है. वहीं, दो-तिहाई विद्यालयों में चहारदीवारी भी नहीं है.

इकलौते शिक्षकवाले स्कूलों में 90% विद्यार्थी दलित या आदिवासी हैं. 64% स्कूलों में खेल का मैदान, 37% स्कूलों में लाइब्रेरी की किताबें नहीं थीं.

दो-तिहाई स्कूलों में मिड-डे मील के लिए पर्याप्त राशि नहीं है. इससे बच्चों को सप्ताह में दो दिन अंडे भी नहीं मिल रहे हैं.

कोरोना काल के बाद वापस विद्यालय से जुड़नेवाले विद्यार्थी लिखना-पढ़ना भूल गये हैं, जिसके सुधार को लेकर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है.

सरकारी स्कूलों में ड्रॉपआउट हो रहे बच्चे

ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड के अध्यक्ष शिवशंकर प्रसाद ने कहा कि राज्य में विद्यालयों के विलय किये जाने से 6700 सरकारी विद्यालय बंद हो गये हैं. इससे दूरस्थ विद्यालय से बच्चे नहीं जुड़ रहे. रिसर्च स्कॉलर पी अमिताव ने कहा कि रांची के कुल 2100 प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में से 520 विद्यालय एक शिक्षक के भरोसे चलाया जा रहा है. उचित पाठ्यक्रम गतिविधि का संचालन न होने के कारण बच्चे ड्रॉपआउट हो रहे हैं.

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यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्‍ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।

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