देवघर में 150 एआई कैमरों से हो रही कांवरियों की सटीक गिनती

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पैदल, रेल, सड़क और हवाई मार्ग से आनेवालेश्रद्धालुओं की हो रही निगरानी.

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राजकीय श्रावणी मेला में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डिजिटल सिस्टम से श्रद्धालुओं की गिनती हो रही है. 150 AI फेस रीडिंग कैमरे दुम्मा से बाबा मंदिर परिसर तक कांवरियों की वास्तविक संख्या दर्ज कर रहे हैं, जिससे पहली बार सटीक आंकड़ा मिल रहा है.

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संजीव मिश्रा की रिपोर्ट

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Shravani Mela AI Counting: राजकीय श्रावणी मेला में बाबा बैद्यनाथ पर जलार्पण करनेवाले श्रद्धालुओं की गिनती अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित डिजिटल सिस्टम से हो रही है. इस वर्ष कांवरियों की गिनती के लिए दुम्मा से लेकर बाबा मंदिर परिसर और कतार मार्ग के अंतिम छोर कुमैठा तक 150 एआई आधारित फेस रीडिंग हेड काउंटिंग कैमरे लगाये गये हैं. ये कैमरे न केवल श्रद्धालुओं की संख्या दर्ज कर रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि किसी कांवरिये की दोबारा गिनती नहीं हो. इससे वास्तविक संख्या का आंकड़ा तत्काल और सटीक रूप से उपलब्ध हो रहा है. समय के साथ कांवरियों की संख्या दर्ज करने की व्यवस्था भी लगातार आधुनिक होती गयी हैं. 

चार मार्गों से आने वाले कांवरियों का पूरा हिसाब

श्रावणी मेले में श्रद्धालु चार अलगअलग मार्गों से देवघर पहुंचते हैं. इनमें पैदल कांवर यात्रा, रेल मार्ग, सड़क मार्ग और हवाई मार्ग शामिल हैं. पैदल आनेवाले कांवरियों की गिनती के लिए दुम्मा में 10 तथा शिवगंगा क्षेत्र में आठ हेड काउंटिंग कैमरे लगाये गये हैं. इसके अलावा बाबा मंदिर के सभी प्रमुख प्रवेश और निकास द्वारों पर 10 कैमरे स्थापित हैं. वहीं संस्कार मंडप, क्यू कॉम्प्लेक्स, नेहरू पार्क होते हुए कतार के टेल प्वाइंट कुमैठा तक 122 फेस रीडिंग कैमरे लगाये गये हैं. कभी सांख्यिकी विभाग के अधिकारी मंदिर का पट खुलने से बंद होने तक मैन्युअल गणना करते थे, लेकिन अब फेस रीडिंग तकनीक से लैस हेड काउंटिंग कैमरे हर श्रद्धालु की सटीक गिनती कर रहे हैं. 

टाइम स्लॉट से डिजिटल सिस्टम तक

श्रद्धालुओं की गिनती की व्यवस्था ने मैन्युअल गणना से लेकर टाइम स्लॉट कार्ड, रिस्ट बैंड और एक्सिस कार्ड तक का सफर तय किया है. श्रावणी मेले के शुरुआती वर्षों में सांख्यिकी विभाग के अधिकारी मैन्युअल तरीके से जलार्पण करने वाले श्रद्धालुओं का आंकड़ा तैयार करते थे. इसके बाद व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए टाइम स्लॉट कार्ड लागू किया गया. फिर कांवरियों के हाथों में रिस्ट बैंड पहनाने की व्यवस्था शुरू हुई. इसके  बाद एक्सिस कार्ड सिस्टम विकसित किया गया, जिसमें बिहार से झारखंड की सीमा में प्रवेश करते ही कांवरियों की फोटो लेकर उन्हें कार्ड जारी होता था. करीब एक दशक तक यह व्यवस्था प्रभावी रही, लेकिन अब इसे पूरी तरह डिजिटल तकनीक ने प्रतिस्थापित कर दिया है.  

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