रांची :जनजातीय स्वास्थ्य परिषद का हो सकता है गठन

Updated at : 17 Jan 2020 9:31 AM (IST)
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रांची :जनजातीय स्वास्थ्य परिषद का हो सकता है गठन

संजय राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने शुरू की तैयारी, ट्राइबल हेल्थ संबंधी अनुशंसा का क्रियान्वयन भी होगा रांची : राज्य में जनजातीय स्वास्थ्य परिषद व निदेशालय का गठन हो सकता है. इसके अलावा जनजातीय स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति तथा इसमें सुधार संबंधी सुझाव देने के लिए बनी केंद्रीय कमेटी की अन्य अनुशंसा भी लागू होगी. राष्ट्रीय […]

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संजय
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने शुरू की तैयारी, ट्राइबल हेल्थ संबंधी अनुशंसा का क्रियान्वयन भी होगा
रांची : राज्य में जनजातीय स्वास्थ्य परिषद व निदेशालय का गठन हो सकता है. इसके अलावा जनजातीय स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति तथा इसमें सुधार संबंधी सुझाव देने के लिए बनी केंद्रीय कमेटी की अन्य अनुशंसा भी लागू होगी.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है. विशेष कमेटी की विभिन्न अनुशंसा पर अमल के लिए एनएचएम ने अगले वित्तीय वर्ष 2020-21 के कार्यक्रम योजना (प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन प्लान या पीआइपी) में इन्हें शामिल किया है. केंद्र की सहमति के बाद इनका क्रियान्वयन होगा. दरअसल, देश भर के 10.40 करोड़ जनजातीय लोगों तथा इनके कुल 705 समुदायों (झारखंड में 32) के स्वास्थ्य तथा इन इलाकों में उपलब्ध वर्तमान स्वास्थ्य सुविधाअों को खराब व नाकाफी मानते हुए कई दिशा-निर्देश दिये गये हैं.
क्या है समस्या : केंद्रीय कमेटी के अनुसार, जनजातीय इलाके में पांच वर्ष या उससे कम उम्र के डेढ़ लाख बच्चों की मौत हर वर्ष होती है. इसके अलावा संचारी रोग जैसे मलेरिया, टीबी, त्वचा का संक्रमण, टायफाइड, हैजा, डायरिया, हेपेटाइटिस व अन्य बीमारियों से भी जनजातीय आबादी प्रभावित है.
तंबाकू व अल्कोहल सेवन, सांप के काटने व जानवरों के हमले सहित स्वास्थ्य सुविधाअों की उपलब्धता व गुणवत्ता की खराब स्थिति से भी इन्हें जूझना पड़ता है. दूसरी अोर, स्वास्थ्य विभाग/मंत्रालय सहित कल्याण विभाग के टीएसपी फंड का इस्तेमाल स्वास्थ्य सुविधाअों पर कितना हो रहा है, यह स्पष्ट नहीं है. आर्टिकल 275 से मिल रहेफंड की भी यही स्थिति है.
क्या है विशेष कमेटी की रिपोर्ट
जनजातीय स्वास्थ्य की हालत तथा इसमें सुधार संबंधी सुझाव व अनुशंसा के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण तथा जनजातीय कल्याण मंत्रालय ने अक्तूबर 2013 में एक विशेष कमेटी का गठन किया था. डॉ अभय बांग की अध्यक्षता में बनी कमेटी में एकेडमिशियन, सिविल सोसाइटी व नीतिगत मामलों के विशेषज्ञ शामिल थे. कमेटी ने कार्यशाला, विशेषज्ञों के साथ बैठक, जनजातीय इलाके में लोगों से मिल कर तथा सेकेडरी डाटा एनालिसिस व परामर्शदाताअों के सहयोग से यह रिपोर्ट तैयार की थी.
सात राज्यों में बड़ी आबादी रहती है
गौरतलब है कि झारखंड सहित देश के सात राज्यों अोड़िशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान में देश की कुल जनजातीय आबादी की दो तिहाई आबादी निवास करती है. इन राज्यों के कुल 90 जिलों के 809 प्रखंडों में कुल आबादी का 50 फीसदी या उससे अधिक जनजातीय अाबादी है. ऐसे इलाके में जनजातीय स्वास्थ्य के कार्यक्रम गंभीरता से लागू करने के सुझाव दिये गये हैं. यह भी कहा गया है कि कमेटी की अनुशंसा अनुसूचित क्षेत्र के अलावा जनजातीय आबादी वाले गैर अनुसूचित इलाके में भी लागू हो.
कमेटी की महत्वपूर्ण अनुशंसा
स्टेट एसटी प्लान के पूरे फंड का कम से कम 15 फीसदी जनजातीय स्वास्थ्य पर खर्च हो. फंड के लिए सिविल सोसाइटी व सीएसआर का भी सहयोग जरूरी.
वर्ष 2022 तक जनजातीय स्वास्थ्य के लिए एक सुदृढ़ व टिकाऊ तंत्र काम करना शुरू कर दे.
इस तंत्र की प्रशासनिक इकाई में पेसा के तहत सशक्त ग्राम सभाअों का भी समावेश हो.
कुल स्वास्थ्य बजट का 8.6 फीसदी जनजातीय स्वास्थ्य पर खर्च हो. जनजातीय कल्याण मंत्रालय को भी ट्राइबल सब प्लान सहित अपने कुल फंड का 15 फीसदी जनजातीय स्वास्थ्य पर खर्च करना चाहिए.
केंद्र के साथ-साथ राज्य स्तर पर जनजातीय स्वास्थ्य परिषद व निदेशालय का गठन हो.
जनजातीय स्वास्थ्य के 70 फीसदी फंड का इस्तेमाल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर खर्च हो.
जनजातीय इलाके में मास मीडिया, लोक संगीत व नाटक के जरिये स्वास्थ्य जागरूकता का प्रचार-प्रसार हो.
जनजातीय इलाके के स्वास्थ्य उपकेंद्रों को ट्राइबल हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के नाम से जाना जायेगा. अगले तीन से पांच वर्षों में ऐसे सेंटर प्रति दो हजार की आबादी पर गठित हो.
करीब 250 की आबादी वाले हर जनजातीय गांव-टोले में पांच लड़के व पांच लड़कियों का चयन आरोग्य मित्र के रूप में किया जायेगा, जिनका काम लोगों में बेहतर स्वास्थ्य व स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना होगा.
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