रांची : नक्सली सरेंडर पॉलिसी को नया लुक देने पर विचार करे सरकार, ताकि गलत संदेश न जाये
Updated at : 26 Oct 2019 1:09 AM (IST)
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राज्य की नक्सली सरेंडर पॉलिसी मामले पर झारखंड हाइकोर्ट ने कहा राज्य सरकार ने जवाब देने के लिए समय लिया मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के बाद होगी रांची : झारखंड हाइकोर्ट में शुक्रवार को राज्य की नक्सली सरेंडर पॉलिसी को लेकर स्वत: संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. एक्टिंग चीफ जस्टिस […]
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राज्य की नक्सली सरेंडर पॉलिसी मामले पर झारखंड हाइकोर्ट ने कहा
राज्य सरकार ने जवाब देने के लिए समय लिया
मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के बाद होगी
रांची : झारखंड हाइकोर्ट में शुक्रवार को राज्य की नक्सली सरेंडर पॉलिसी को लेकर स्वत: संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. एक्टिंग चीफ जस्टिस हरीशचंद्र मिश्र व जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सरेंडर पॉलिसी पर सवाल उठाते हुए माैखिक रूप से टिप्पणी की.
खंडपीठ ने कहा कि जघन्य अपराध कर सरेंडर करनेवाले नक्सलियों के सरेंडर का महिमामंडन से समाज में गलत संदेश जाता है. एक तरफ नक्सली घटनाअों से पीड़ित परिवार को मुआवजा आदि के लिए दर-दर भटकना पड़ता है. वहीं दूसरी तरफ जघन्य घटनाअों को अंजाम देनेवाले नक्सलियों को माला पहना कर समारोहपूर्वक सरेंडर कराया जाता है.
उन्हें पुनर्वास के लिए राशि दी जाती है. सरकार को अपनी सरेंडर पॉलिसी को नया लुक देना चाहिए. उसकी समीक्षा करनी चाहिए, ताकि लोगों में इसका गलत संदेश नहीं पहुंचे. खंडपीठ की भावना को देखते हुए राज्य सरकार की अोर से अपर महाधिवक्ता मनोज टंडन ने जवाब देने के लिए समय देने का आग्रह किया. खंडपीठ ने आग्रह स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी.
एमेक्स क्यूरी ने कहा
इससे पूर्व मामले के एमेक्स क्यूरी अधिवक्ता हेमंत कुमार सिकरवार ने खंडपीठ को बताया कि सरेंडर पॉलिसी के तहत मई 2017 में नक्सली कुंदन पाहन के आत्मसमर्पण को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रदर्शित किया गया था. समारोहपूर्वक माला पहना कर उसे सरेंडर कराया गया था. उसके पुनर्वास के लिए 15 लाख रुपये का नकद इनाम दिया गया. वह लूट, डकैती व हत्या के 128 मामलों में आरोपी है.
इस तरह समारोह आयोजित कर जघन्य अपराध करनेवाले नक्सलियों को सरेंडर कराये जाने से समाज में गलत संदेश जाता है. इसे रोकने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एक नक्सली को गले लगाता है, उसे माला पहनाता है, तो जूनियर स्तर के अधिकारियों को अदालत में वैसे नक्सलियों के खिलाफ सबूत पेश करने का साहस नहीं होगा.
नक्सलियों के अधिकांश मामले में गवाह या तो गवाही नहीं देते हैं या मुकर जाते हैं. सबूतों के अभाव में नक्सली आरोपों से बरी हो जाते हैं. पुलिस गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी नहीं करती है. गवाह को हमेशा अपनी जान का डर सताता रहता है.
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