Jharkhand : रांची में एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट कंपोनेंट ‘UMMID’ की लांचिंग 10 अक्टूबर को

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रांची : आनुवांशिक रोगों (Genetic Diseases) से पीड़ित लोगों के लिए गुरुवार को राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में एक केंद्र की शुरुआत होने जा रही है. यह केंद्र किसी वरदान से कम नहीं है. इसे उम्मीद (UMMID) नाम दिया गया है. इस केंद्र के काम शुरू करने के बाद भारी संख्या में गंभीर बीमारियों के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में कमी आयेगी. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा गुरुवार को झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के ऑडिटोरियम में एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट कंपोनेंट ‘उम्मीद’ की लांचिंग करेंगे.

कार्यक्रम का आयोजन नयी दिल्ली स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग और रांची स्थिति राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स) के शिशु रोग विभाग और प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने संयुक्त रूप से किया है. कार्यक्रम में झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी, रांची के सांसद संजय सेठ, कांके के विधायक जीतुचरण राम, स्वास्थ्य सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी, रांची नेशनल हेल्थ मिशन के निदेशक डॉ शैलेश कुमार चौरसिया मौजूद रहेंगे.

सुबह 9 बजे से 12 बजे तक आयोजित यह कार्यक्रम दो भागों में विभाजित है. पहले भाग में वैज्ञानिक परिचर्चा होगी, तो दूसरे भाग में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट कंपोनेंट UMMID यानी यूनिक मेथड्स ऑफ मैनेजमेंट ऑफ इनहेरिटेड डिस्ऑर्डर्स’ प्रोग्राम (Unique Methods of Management of Inherited Disorders Programme) को लांच करेंगे.

कार्यक्रम की लांचिंग के बाद रिम्स में डीबीटी उम्मीद के तहत एंटीनेटल स्क्रीनिंग एंड न्यूबोर्न स्क्रीनिंग (Antenatal Screening and Newborn Screening) की शुरुआत हो जायेगी. इसके तहत बच्चे के जन्म के पहले मां की और जन्म के बाद जच्चा-बच्चा की जरूर जांच की जायेगी. किसी भी गंभीर आनुवांशिक बीमारी के लक्षण मिलते ही उसका उपचार शुरू कर दिया जायेगा. ये सारी जांच व चिकित्सा मुफ्त में होगी.

कार्यक्रम के पहले भाग में डॉ अनुपा प्रसाद सीएमइ के उद्देश्यों के बारे में बतायेंगी. डॉ मीनाक्षी बोथरा ‘जेनेटिक डिस्ऑर्डर्स : मैग्नीट्यूड ऑफ द प्रॉब्लम इन इंडिया’ विषय पर बोलेंगी. इस विषय के तहत वह भारत में होने वाले आनुवांशिक रोगों की स्थिति और उसकी भयावहता के बारे में विस्तार से जानकारी देंगी. जेनेटिक रोगों की रोकथाम में माता-पिता की भूमिका के बारे में श्रीमती सारिका मोदी बतायेंगी. इसी दौरान लोगों को जागरूक करने में लायंस क्लब की भूमिका के बारे में भी जानकारी दी जायेगी.

जेनेटिक रोगों के बिहार-झारखंड के एकमात्र विशेषज्ञ डॉक्टर और रिम्स के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ अमर वर्मा ‘झारखंड में जेनेटिक रोगों की स्क्रीनिंग की जरूरत’ पर प्रकाश डालेंगे. रिम्स की डॉ अनुभा विद्यार्थी कॉमन जेनेटिक डिस्ऑर्डर्स की रोकथाम के लिए माता-पिता की जांच के बारे में बतायेंगी, तो डॉ भावना धींगड़ा नवजात शिशुओं की जांच की प्रासंगिता पर विचार रखेंगी. इसी सत्र में नयी दिल्ली स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डॉ सुनील कुमार पोलीपल्ली ‘जेनेटिक रोगों की जांच : कब क्या करें?’ पर विस्तार से अपनी बात रखेंगे.

इतना ही नहीं, डीबीटी की सलाहकार डॉ सुचिता निनावे ‘UMMID’ कार्यक्रम और उसके फायदे के बारे में विस्तार से जानकारी देंगी. वहीं, झारखंड के स्वास्थ्य सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी झारखंड में आनुवांशिक रोगों की स्क्रीनिंग के असर के बारे में बतायेंगे. एनएचएम (रांची) के निदेशक डॉ शैलेश कुमार चौरसिया ‘झारखंड में हेल्थ मिशन की बढ़ती भूमिका’ के बारे में जानकारी देंगे. इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री, झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ स्थानीय सांसद और विधायक UMMID बुकलेट भी जारी करेंगे.

इसलिए वरदान साबित होगा UMMID

कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शिशु के पैदा होने से पहले ही मां-बाप द्वारा उसे मिल जाती हैं. इन्हीं बीमारियों को अनुवांशिक बीमारियां या जेनेटिक डिस्ऑर्डर कहते हैं. डायबिटीज, कैंसर, हार्ट अटैक जैसी सैकड़ों खतरनाक बीमारियां हैं, जो किसी व्यक्ति को हो, तो उसकी अगली पीढ़ी में इस बीमारी के होने की संभावना बढ़ जाती है. दरअसल, मां के गर्भ में जब शिशु का विकास हो रहा होता है, तभी मां-बाप के जीन्स के द्वारा ये बीमारियां शिशु के जीन्स में पहुंच जाती हैं.
कई शिशुओं में आनुवांशिक बीमारियों के लक्षण वयस्क होने या अधेड़ होने के बाद दिखते हैं, जबकि कुछ बच्चों में ये जन्म के 1-2 साल बाद ही दिखना शुरू हो जाते हैं. इन बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि प्रेग्नेंसी के दौरान हर महिला जेनेटिक टेस्ट करवाये.

हर 5 सेकेंड में होती है एक बच्चे की मौत

युनाइटेड नेशंस इंटर एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टलिटी इस्टिमेशन (UNIGME) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2017 में भारत में 8 लाख से ज्यादा शिशुओं की मौत हुई. मरने वाले 1,52,000 बच्चों की उम्र 5-14 साल थी. दूसरी तरफ, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 में दुनिया भर में 15 साल से कम उम्र के कुल 60 लाख से अधिक बच्चों की मौत हुई. इनमें 50.4 लाख बच्चों की उम्र 5 साल से कम थी. इन आंकड़ों के अनुसार, विश्व में हर 5 सेकेंड में 15 साल से कम उम्र के एक बच्चे की मृत्यु हो जाती है. इनमें 50 फीसदी बच्चों की मौत जेनेटिक बीमारियों की वजह से हुईं.

कब जरूरी है जेनेटिक टेस्ट

पति-पत्नी में से किसी एक में कोई जेनेटिकल (वंशानुगत) बीमारी है, परिवार में आनुवांशिक बीमारियों का इतिहास है, गर्भावस्था के समय मां के साथ कुछ बुरा घटा है या महिला के पहले के बच्चे में कुछ जन्मजात विसंगतियां रही हों. जेनेटिक टेस्ट उन महिलाओं के लिए भी जरूरी है, जो देर से (आमतौर पर 30-35 साल के बाद) गर्भधारण करती हैं. थैलेसीमिया, सिकल सेल, हार्ट अटैक आदि ऐसी आनुवांशिक बीमारियां हैं, जो खतरनाक हैं. इसके अलावा डायबिटीज, मोटापा, खून की बीमारियां, दिल की बीमारियां, आंख की बीमारियां, मिर्गी, कैंसर आदि ऐसे विकार हैं, जो जन्म से पहले ही शिशु में मां-बाप के जीन्स द्वारा प्रवेश कर सकते हैं. इसलिए इन बीमारियों से बचाव के लिए जेनेटिक टेस्ट करना जरूरी है.

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