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प्रभात खबर@35 के मीडिया कॉन्क्लेव में बोले प्रभु चावला : TV चैनलों की वजह से बदनाम हो रहा मीडिया

Updated at : 11 Aug 2019 11:18 AM (IST)
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प्रभात खबर@35 के मीडिया कॉन्क्लेव में बोले प्रभु चावला : TV चैनलों की वजह से बदनाम हो रहा मीडिया

रांची : अखबार आज भी सूचना का सबसे विश्वसनीय स्रोत है. मीडिया पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन कभी प्रिंट मीडिया को किसी ने भला-बुरा नहीं कहा. टीवी चैनलों पर बैठकर चीखने-चिल्लाने वाले लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है. आने वाले दिनों में पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है. हालांकि, उसके सामने […]

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रांची : अखबार आज भी सूचना का सबसे विश्वसनीय स्रोत है. मीडिया पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन कभी प्रिंट मीडिया को किसी ने भला-बुरा नहीं कहा. टीवी चैनलों पर बैठकर चीखने-चिल्लाने वाले लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है. आने वाले दिनों में पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है. हालांकि, उसके सामने कई चुनौतियां भी हैं. ऐसा नहीं है कि पहले चुनौतियां कम थीं. चुनौतियां पहले भी थीं, अब भी हैं और आगे भी रहेंगी. तमाम चुनौतियों से निबटते हुए पत्रकारिता ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है और आगे भी अपनी जिम्मेवारियां उसे निभानी होगी.
ये बातें देश के वरिष्ठ चार पत्रकारों ने प्रभु चावला, आलोक मेहता, आर राजगोपालन और संजीव श्रीवास्तव ने राजधानी रांची के रेडिशन ब्लू होटल में ‘प्रभात खबर’ के 35वें स्थापना दिवस समारोह के दूसरे दिन मीडिया कॉन्क्लेव में कहीं. ‘पत्रकारिता से उम्मीदें’ विषयक कॉन्क्लेव में वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने कहा कि टीवी मीडिया में बैठे लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम किया है. न्यूज एंकर ज्यादा बोलता है और गेस्ट को बोलने नहीं देता. टीवी चैनल में बैठे एंकर्स के पास सूचना का अभाव होता है. अखबारों को कोई भला-बुरा नहीं कहता.
श्री चावला ने कहा कि आज खबर के मायने बदल गये हैं. आज विज्ञापन भी खबर बन गया है. पहले के जमाने में मंत्री और मुख्यमंत्री पत्रकारों और संपादकों से मिलने उनके पास आते थे. आज संपादक ही मंत्री और मुख्यमंत्री से मिलने चला जाता है. उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि आज भी प्रिंट मीडिया पर लोगों का भरोसा कायम है. कहा कि लोगों का भरोसा आगे भी कायम रहेगा. उन्होंने कहा कि मीडिया पर पाठकों और दर्शकों का भरोसा इसलिए कम हुआ है, क्योंकि मीडिया सत्ता का साथी बन गया है. मीडिया को सत्ता का विरोधी होना चाहिए.
प्रभु चावला ने कहा कि कॉलेज के मेरे कई मित्र आज मंत्री हैं. पहले की सरकार में भी मंत्री थे. मेरी उन मंत्रियों के साथ कभी नहीं बनी, क्योंकि मैंने उनके साथ समझौता नहीं किया. उन्होंने कहा कि आज और पहले की पत्रकारिता में काफी अंतर आ गया है. अब पत्रकारिता मिशन नहीं, प्रोफेशन और बिजनेस बन गया है. उन्होंने कहा कि मार्केटिंग के दबाव में एडिटोरियल तरह-तरह की बेचने वाली खबरें प्रकाशित कर रहा है. मीडिया से विचार नाम की शक्ति गायब होने की वजह से पत्रकारिता प्रोफेशन बनती जा रही है. अब पत्रकारिता में केवल बिजनेस मॉडल की चर्चा हो रही है. अखबरों में बाइलाइन खत्म हो गयी.

क्षेत्रीय मीडिया का भविष्य है बेहतर : संजीव श्रीवास्तव

बीबीसी में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव ने कहा कि आज खबरों के दोनों पहलू नहीं दिखाये जाते. उन्होंने कहा कि हर चीज के दो पहलू होते हैं. लेकिन, हर प्रसंग, हर घटना, हर खबर का एक ही पहलू आज सामने आ रहा है. दूसरे पहलू को मीडिया पूरी तरह से रौंदते हुए निकल जाता है. आखिर मीडिया पाठकों को, श्रोताओं को, दर्शकों को इतना बेवकूफ क्यों समझता है.
उन्होंने कहा कि आज की तारीख में नेशनल मीडिया से बेहतर भविष्य क्षेत्रीय मीडिया का है. कहा कि 35 साल के पत्रकारिता में महसूस करता हूं कि आज की डेट में चुनौती सबसे ज्यादा है. तटस्थता और निष्पक्षता ये दो चीजें ऐसी हैं, जिससे भरोसा कायम नहीं हो रहा. उन्होंने पत्रकारिता के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि जब आप इस क्षेत्र में आयें, तो यथार्थ के साथ आयें.
उन्होंने कहा कि लाइफ आज इंटेलिजेंट कॉम्प्रोमाइज मेकिंग है. वही आज मीडिया की कहानी है. इसमें 99 फीसदी मीडिया फेल है. वह स्टुपिड कॉम्प्रोमाइज मेकिंग कर रहा है. इमरजेंसी के समय एक मशहूर संपादक ने कहा था कि जब उनसे झुकने को कहा गया, तो लोग लोटने लगे. आज भी वही स्थिति है. उन्होंने कहा कि समय-काल के अनुरूप ढलना ही पत्रकारों का सबसे बड़ा गुण रहा है. नारद के काल से. यह सिर्फ मीडिया के लोगों की समस्या नहीं है. कहा कि यदि आपको आंदोलन करना है, तो अकेले करें. किसने रोका है.
श्री श्रीवास्तव ने कहा कि दुनिया बदल रही है. मीडिया में वह बदलाव दिखना चाहिए. उन्होंने कहा कि जिस दौर में वे पत्रकार बने, वह वैसा दौर था, जब लोगों को कोई नौकरी नहीं मिलती थी, तो पत्रकारिता में आ जाते थे. आज के पत्रकार दुनिया से ज्यादा कनेक्टेड हैं. वह ज्यादा पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल और समझदार हैं.

सीबीआइ से आगे हैं हम : आर राजगोपालन

वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपालन ने 40 वर्षों की पत्रकारिता का अनुभव साझा किया. कहा कि 2014 के बाद पत्रकारिता से उम्मीदें कम हुई हैं. खोजी पत्रकारिता अब बीते दिन की बात हो गयी है. सरकार के खिलाफ खबरों पर अघोषित रोक लगी हुई है. दिल्ली में पत्रकारों को अब कोई सरकारी दस्तावेज नहीं मिलता. उन्होंने धारा 370 का जिक्र करते हुए कहा कि राज्यसभा में आने से पहले किसी भी पत्रकार को इसकी हवा तक नहीं लगी.
उन्होंने कहा कि 30 वर्षों तक उन्होंने प्रिंट मीडिया में काम किया. वर्ष 2014 के बाद पत्रकारिता खत्म हो गयी. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद विदेश से लौटे और एक अधिकारी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को प्रभावहीन करने वाले विधेयक पर हस्ताक्षर करवा लिया. दिल्ली में बैठे किसी पत्रकार को इसकी भनक तक नहीं लगी. आखिर पत्रकार कर क्या रहे थे? उन्होंने वर्ष 2014 में ‘राजीव गांधी की हत्या में डीएमके का हाथ’ होने संबंधी एक खबर का जिक्र किया. कहा कि वे और प्रभु चावला जैसे पत्रकार सीबीआइ से भी आगे हैं.

अखबार के अच्छे दिन कब आयेंगे : केके गोयनका

इससे पहले, ‘प्रभात खबर’ के एमडी केके गोयनका ने पत्रकारिता और विज्ञापन पर अपने विचार साझा किये. उन्होंने कहा कि लागत से कम कीमत पर अखबार बिक रहे हैं. बड़े घरानों से क्षेत्रीय पत्रों का मुकाबला बढ़ गया है. मीडिया को तकनीक और साख की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में ‘प्रभात खबर’ का और विस्तार करेंगे. इसके अलावा उन्होंने पत्रकारिता की संभावना पर भी चर्चा की.
प्राइस वार का जिक्र करते हुए कहा कि बिना विज्ञापन के अखबार नहीं चला सकते. कहा कि अखबार पर भरोसा लोगों का आज भी कायम है. टीवी चैनल अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं. उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि अखबार में पहले कंटेंट किंग होता था, आज वही कंटेंट क्वीन है. श्री गोयनका ने कहा कि विज्ञापन पर अखबारों की निर्भरता बढ़ गयी है. पाठकों को बेहतर पेज डिजाइन, प्रिंट, ले-आउट और प्रोमोशनल ऑफर पसंद हैं. आज अखबार को साबुन और तेल की तरह बेचा जा रहा है.

प्रभात खबर के प्रबंध निदेशक ने कहा कि विज्ञापन के बगैर अखबार निकालना मुश्किल है. 70 फीसदी राजस्व विज्ञापन से आते हैं. इसमें सरकारी विज्ञापन का हिस्सा बड़ा होता है. इसलिए सरकार के खिलाफ जाने की हिम्मत अखबार नहीं कर सकते. दूसरी तरफ, टीवी चैनलों की विश्वसनीयता खत्म हो रही है. सोशल मीडिया पर 80 से 90 फीसदी खबरें फेक न्यूज होती हैं. अखबारों की विश्वसनीयता अब भी बरकरार है.
उन्होंने कहा कि यदि अखबार को अपना अस्तित्व बचाये रखना है, तो संपादकीय और मार्केटिंग के लोगों को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने कॉन्क्लेव में शामिल वरिष्ठ पत्रकारों से पूछा कि पत्रकारिता के अच्छे दिन कब आयेंगे, ताकि हम फिर से कह सकें कि कंटेंट इज किंग, नॉट क्वीन.

पत्रकारिता की असली चुनौती उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखने की है : आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि अच्छे कॉपी राइटर की मीडिया में आज भी बहुत कमी है. मीडिया के लोग अपने जमाने को आदर्श युग और स्वर्णिम काल कहते हैं बाद की पीढ़ी के पत्रकारों को बेकार बताते हैं. लेकिन, चुनौतियां तब भी थीं और अब भी हैं. श्री मेहता ने कहा कि ‘प्रभात खबर’ से उनका पुराना नाता है. वे प्रभात खबर के संस्थापक ज्ञानरंजन को भी जानते थे. वह जानते हैं कि ज्ञानरंजन बेहतर अखबार के प्रकाशन को लेकर चिंतित रहते थे और लोगों से इस संबंध में बातें करते रहते थे.

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के सामने असली चुनौती समाचार पत्रों की विश्वसनीयता को बनाये रखना है. पत्रकार का काम अखबार बेचना नहीं है, लेकिन उसे यह देखना चाहिए कि अखबार बांटने वाले हॉकर को समय पर समाचार पत्र बांटने की सहूलियत हो और लोग अखबार खरीदकर पढ़ें.
श्री मेहता ने कहा कि हम ही नालायक नहीं हैं. पहले भी बहुत लायक लोग थे, लेकिन समस्याएं तब भी थीं. हिंदुस्तान में पहले पन्ने पर ‘बाल सफा’ का विज्ञापन छपता था. यहां तक कि नेहरू जी के भाषण के बीच में ऐसे विज्ञापन छपते थे. आज ऐसा नहीं होता. इसलिए यह कहना कि अभी सब गड़बड़ है, ऐसा नहीं है. पहले भी हालात बुरे थे. आज से ज्यादा चुनौतियां तब के प्रबंधन की थीं. इमरजेंसी से पहले भी टाटा जैसी कंपनियों का दबाव रहता था, भले सरकार के प्रभाव में होता रहा हो.
पत्रकारिता में आये हैं, तो तैयार रहिये बिस्तर बांधकर. यदि पैसे ही कमाने हैं, तो पान की दुकान खोल लीजिए. अच्छे पैसे कमा लेंगे. जब हम पढ़ते थे, तो कॉलेज के बाहर पान का ठेला लगाने वाला करोड़पति बन गया. हमने ऐसा कर लिया होता, तो हम भी करोड़पति हो जाते, लेकिन आज भी उतना नहीं कमा पाये. इसलिए यदि आप मीडिया में हैं, तो पूरी शिद्दत के साथ पत्रकारिता करें.
श्री मेहता ने कहा कि कठिनाइयों के बीच काम करने के लिए ‘प्रभात खबर’ जाना जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि समाचार छापने की आप हिम्मत करिये. उसका नतीजा भुगतने का भी साहस रखिये. साथ ही कहा कि शहरों में पत्रकारिता करने वालों को दिक्कत बहुत कम है. जिला स्तर के पत्रकारों के लिए खतरे ज्यादा हैं.
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे समय बदला है, अखबारों के रूप भी बदले हैं. 80 के दशक में भारत में संपादक रंगीन फोटो नहीं छापते थे. समय के साथ-साथ तकनीक बदली और रंगीन फोटो के बगैर अब काम ही नहीं चलता. मीडिया का स्वरूप बदला. टीवी चैनल और वेबसाइट्स की बाढ़ आ गयी. लोगों ने कहा कि अब अखबार और पत्रिकाएं कौन पढ़ता है. यह सच नहीं है. आज भी लोग अखबार पढ़ते हैं. उन्होंने कहा कि जर्मनी में मुफ्त में अखबार मिलते थे. लोग देखते थे और फेंक देते थे. लेकिन, जिस अखबार को हम खरीदते हैं, उसे सहेजकर रखते हैं. उसे घर ले जाकर पढ़ते थे.
आलोक मेहता ने कहा कि तकनीक की वजह से अखबार खत्म हो जायेंगे, ऐसा नहीं है. ऐसा होता, तो जापान में अखबार नहीं छपते, क्योंकि वहां की तकनीक भी हमसे बहुत आगे है और मोबाइल भी वहां बहुत ज्यादा हैं. इसलिए अखबार को उस कंटेंट पर काम करना चाहिए, जो वेबसाइट या टेलीविजन चैनल पर उपलब्ध नहीं हैं. श्री मेहता ने कहा कि यह हर पत्रकार का दायित्व है कि वह ऐसा कंटेंट परोसे, जो पाठक को अन्यत्र नहीं मिले.
श्री मेहता ने कहा कि हमने अपने अखबारों को टैब्लॉयड में तब्दील कर दिया है. जब से अखबार में ही हर तरह के मसाले डालने शुरू कर दिये, समस्या तब से बढ़ गयी. इसलिए मैनेजमेंट को और पत्रकारों को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी. उन्होंने कहा कि मीडिया यदि सीमा में रहे, तो कोई राजनेता आपका बहुत ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. कहा कि पत्रकारों को विपरीत परिस्थितियों में भी समाचारों में संतुलन बनाये रखना होगा.
उन्होंने कहा कि असली चुनौती इस बात की है कि आप कितनी निर्भीकता के साथ पत्रकारिता करते हैं. यदि आप श्रेष्ठ कंटेंट देंगे, तो विज्ञापन का दबाव भी कम हो जायेगा. प्रभात खबर की ग्रामीण पत्रकारिता की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि वह भी ग्रामीण अखबार निकालने का प्रस्ताव स्वीकार कर चुके थे. हालांकि, वह अखबार निकल नहीं पाया. श्री मेहता ने सलाह दी कि ग्रामीण पत्रकारिता पर जोर देना चाहिए. कहा कि झारखंड के पड़ोसी राज्यों में ग्रामीण समाचार पत्रों को काफी बढ़ावा दिया जा रहा है.

इससे पहले ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक आशुतोष चतुर्वेदी ने विषय प्रवेश कराया. उन्होंने बताया कि संयुक्त बिहार के एक छोटे से जिले से शुरू होने वाला यह अखबार आज हिंदी के देश के शीर्ष 6 अखबारों में शामिल है, जबकि सभी भाषाओं के शीर्ष अखबारों में 11वें नंबर पर है. वर्ष 1989 में 500 प्रसार संख्या वाले इस समाचार पत्र की पाठक संख्या आज करीब डेढ़ करोड़ हो चुकी है. कार्यक्रम का संचालन ‘प्रभात खबर’ के कॉर्पोरेट एडीटर विनय भूषण ने किया.

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