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कमल नयन चौबे ने संभाला झारखंड के डीजीपी का दायित्व, बोले मैं सपने नहीं बेचता, पुलिस को बनाऊंगा मानवीय व संवेदनशील

9 Jun, 2019 8:15 am
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कमल नयन चौबे ने संभाला झारखंड के डीजीपी का दायित्व, बोले मैं सपने नहीं बेचता, पुलिस को बनाऊंगा मानवीय व संवेदनशील

रांची : 1986 बैच के तेजतर्रार आइपीएस अधिकारी माने जाने वाले कमल नयन चौबे ने शनिवार को पुलिस मुख्यालय में झारखंड के 12वें डीजीपी के तौर पर स्वत: पदभार ग्रहण किया. उन्होंने कहा, मैं सपने नहीं बेचता. सपनों का सौदागर नहीं हूं. इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि बहुत ईमानदारी, मेहनत और सार्थक प्रयास […]

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रांची : 1986 बैच के तेजतर्रार आइपीएस अधिकारी माने जाने वाले कमल नयन चौबे ने शनिवार को पुलिस मुख्यालय में झारखंड के 12वें डीजीपी के तौर पर स्वत: पदभार ग्रहण किया. उन्होंने कहा, मैं सपने नहीं बेचता.
सपनों का सौदागर नहीं हूं. इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि बहुत ईमानदारी, मेहनत और सार्थक प्रयास पुलिस महानिदेशक के तौर पर करूंगा. झारखंड पुलिस में एक सामूहिक नेतृत्व होगा. एक ऐसा नेतृत्व होगा, जिसमें बातचीत होगी. पारदर्शिता होगी. जिसमें मर्यादा होगी.
पूरे पुलिस परिवार को एक टीम और परिवार के रूप में साथ लेकर काम करने का प्रयास होगा. यह कठिन है, लेकिन कोशिश जरूर करूंगा. आज भी अपने अफसरों को संबोधन में कहा है कि जब भी मैं इस जगह से विदा लूं, मेरे सहकर्मियों को यह अहसास हो कि नेतृत्व को मैंने एक मर्यादित व निष्पक्ष ढंग से निभाया.
सबको यह लगे कि सबकी आवाज नेतृत्व तक पहुंच सकी है. तब मैं यह समझूंगा कि मैंने अपना फर्ज अदा किया. नक्सल, संगठित अपराध व साइबर क्राइम सहित कई मुद्दों पर प्रभात खबर के वरिष्ठ संवाददाता प्रणव ने कमल नयन चौबे से बातचीत की. पेश है उसके अंश.
आपने नयी जिम्मेदारी संभाली है, इसके लिए प्रभात खबर की ओर से आपको बधाई. आपकी प्राथमिकता क्या होगी?
शुक्रिया. जहां तक पुलिस के उत्तरदायित्व का सवाल है, तो देश के किसी भी प्रदेश में उनकी दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है. एक अपराध नियंत्रण और दूसरा विधि व्यवस्था का संधारण. वह दोनों एक पारंपरिक रोल है पुलिस का. इसको हम भी निभायेंगे. लेकिन झारखंड के परिप्रेक्ष्य में एक जो बड़ी समस्या है,वह है चरम वामपंथ का. जिसे आमतौर की भाषा में नक्सल की समस्या कहते हैं. राज्य पुलिस के लिए करीब डेढ़ दशकों से यह प्राथमिकता में रही है. वर्तमान में नक्सल के खिलाफ जो अभियान चल रहे हैं, वह मजबूती से चलते रहेंगे. अभियान में और गति आयेगी.
संगठित अपराध को लेकर अापका क्या नजरिया होगा?
राज्य में अपराध पर सशक्त नियंत्रण हो सके. ऐसा अहसास हो अवाम को कि वे सभ्य समाज में रहते हैं. सौ फीसदी खात्मा संभव नहीं होता, लेकिन अपराध ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण में रह सके, यह एक और प्राथमिकता होगी. जिलों के जो पुलिस अधिकारी हैं, वे अपने इलाकों के अपराधों की विवेचना करें. समीक्षा करें. साथ ही अपराध पर कैसे मजबूती से नियंत्रण पाया जा सके, इसको लेकर वे कार्रवाई करें. यह सुनिश्चित कराऊंगा.
आज भी थाना स्तर पर लोग पुलिस के पास जाने से घबराते हैं. जबकि थाने से ही पुलिस की छवि का आकलन होता है?
पुलिस अवाम के ज्यादा से ज्यादा नजदीक आ सके. उसका एक मानवीय चेहरा हो. उसमें संवेदनशीलता होनी चाहिए. पुलिस को हितैषी के रूप में, मददगार के रूप में और एक मित्र के तौर पर लोग देख सकें, ऐसी पुलिसिंग की हमारी कोशिश होगी.
नक्सल और अपराध पर नियंत्रण को लेकर आपका कोई टाइम फ्रेम होगा?
देखिये, मैं तुरंत आया हूं. अभी मैंने चार्ज लिया है. यहां की चीजों को समझने में थोड़ा वक्त लगेगा. लेकिन आपको मैं बता दूं कि कितने दिनों में क्या होगा, यह नहीं कह सकता. क्योंकि मैं आदतन सपने नहीं बेचता. मैं सपनों का सौदागर भी नहीं हूं. इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि बहुत ईमानदारी के साथ, बहुत मेहनत के साथ और सार्थक प्रयास पुलिस महानिदेशक के तौर पर जरूर करूंगा. पुलिस के पास संसाधन है. उसका कैसे उपयोग हो रहा है, उसकी समीक्षा करेंगे.
साइबर अपराध के कारण देश के दूसरे राज्यों में भी झारखंड की छवि धूमिल होती है, कैसे लगाम लगायेंगे?
साइबर क्राइम राज्य और देश में ही नहीं बल्कि विश्व में उभरता हुआ मुश्किल क्राइम है. क्योंकि साइबर अपराध के लिए कोई राज्य या देश की सीमा नहीं होती. यह इंटरनेट बेस्ड होता है. आप अफ्रीका में रहकर हिंदुस्तान में परेशानी पैदा कर सकते हैं. वैसे ही हिंदुस्तान में रहकर कहीं और. अपराधी कहीं से भी साइबर क्राइम को अंजाम दे सकता है. झारखंड में एक जिला (जामताड़ा) है, जहां पर साइबर अपराध की रिपोर्ट ज्यादा आती है. मैं इसे लेकर सभी पदाधिकारियों से बात करूंगा. विशेषज्ञों की मदद ली जायेगी, ताकि साइबर अपराध से निजात पायी जा सके.
जेल में बंद अपराधी फोन के जरिये अपना गैंग चलाते हैं, कैसे रोक लगेगी इन पर?
कई लोग न्यायिक हिरासत में रहते हुए अपराध करते हैं. उस पर रोक लगाने और नजर रखने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर है. वह कितना एक्टिव है, आज की तारीख में मैं अभी नहीं बता पाऊंगा, लेकिन इस पर नजर रखी जायेगी.
कोयले की कालिख का दाग पुलिस पर लगता रहा है, कैसे सुधार आयेगा?
देखिये, अब तक इस पर क्या कार्रवाई हुई होगी, यह मैं नहीं जानता. लेकिन आपको बता दूं कि कोयले के मालिक हमलोग नहीं हैं. कोल इंडिया कोयले का मालिक है. कोल इंडिया की जो संपत्ति है, उसके लिए उनका पुलिस फोर्स है.
उससे राज्य को राजस्व मिलता है. लेकिन कोयले की चोरी होती है. इस पर सबको कार्रवाई करनी होगी. सतही कार्रवाई नहीं. मेरी समीक्षा के दौरान अगर कोल इंडिया के अधिकारी कहें कि मैंने 10 चिट्ठी लिखी है, तो इससे नहीं चलेगा. कोल इंडिया अपने फोर्स के अलावा हमसे राष्ट्रीय संपत्ति के बचाव के लिए फोर्स मांगेंगे, तो उन्हें फाेर्स दी जायेगी. लेकिन उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंने फोर्स से क्या काम लिया.
झारखंड पुलिस की कार्यसंस्कृति में क्या बदलाव लाना चाहेंगे?
मैंने भारत सरकार के कई निर्णय को करीब से देखा है. वहां की संस्कृति है कि कई मुद्दों पर वैचारिक मतभिन्नता होती है. लेकिन किसी मुद्दे पर अगर सामूहिक रूप से निर्णय ले लिया जाता है, तो फिर फाइनल होता है.
भले ही किसी की बात एक फीसदी मानी गयी या पांच फीसदी. लेकिन निर्णय के बाद नीचे स्तर पर कोई अमर्यादित बात नहीं होती. मेरी यह कोशिश होगी कि भारत सरकार की इस संस्कृति को झारखंड में भी लागू करें. इसमें मुझे कितनी सफलता मिलेगी, यह मैं नहीं जानता. लेकिन मैं खुद का इस स्तर पर आकलन करूंगा कि मैंने कड़ी मेहनत और प्रयास किया या नहीं.
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