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रांची : 1.47 करोड़ के घोटाले का मामला, को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में प्राथमिकी

Updated at : 08 Apr 2019 8:11 AM (IST)
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रांची : 1.47 करोड़ के घोटाले का मामला, को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में प्राथमिकी

रांची : सरकारी आदेश के चार माह बाद 1.47 करोड़ रुपये के को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है. प्राथमिकी में जादूगोड़ा ब्रांच के तत्कालीन ब्रांच मैनेजर उमेश प्रसाद सिंह और असिस्टेंट मैनेजर राज श्रीवास्तव को नामजद अभियुक्त बनाया गया है. फर्जी दस्तावेज बनाये : प्राथमिकी में कहा गया है कि उमेश प्रसाद […]

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रांची : सरकारी आदेश के चार माह बाद 1.47 करोड़ रुपये के को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है. प्राथमिकी में जादूगोड़ा ब्रांच के तत्कालीन ब्रांच मैनेजर उमेश प्रसाद सिंह और असिस्टेंट मैनेजर राज श्रीवास्तव को नामजद अभियुक्त बनाया गया है.

फर्जी दस्तावेज बनाये : प्राथमिकी में कहा गया है कि उमेश प्रसाद सिंह और राज श्रीवास्तव ने सुनियोजित साजिश के तहत उदय प्रताप सिंह को 89.46 लाख रुपये और केएस हामिद मदीन कुटी को 25.53 लाख रुपये का ओवर ड्राफ्ट दिया. इन दोनों अधिकारियों ने इस मामले में कर्ज देने की अपनी वित्तीय शक्तियों का उल्लंघन किया. बाद में इन दोनों अधिकारियों ने इस पर पर्दा डालने के लिए बैंक के कंप्यूटराइजेशन के पहले 23 फर्जी खाते खोले.

इन फर्जी खातों में इस रकम को कर्ज के रूप में दिखाने का दस्तावेज तैयार किया. इसके बाद इसकी वसूली के भी फर्जी दस्तावेज तैयार किये. इस मामले की शिकायत मिलने के बाद सरकार के स्तर पर हुई जांच में यह पाया गया कि भाटिया बस्ती, हनुमान मंदिर के नजदीक, कदमा जमशेदपुर निवासी उदय प्रताप सिंह ने 22 मार्च 2002 को 100 रुपये में खाता खोला.

इसके बाद उमेश प्रसाद सिंह ने पांच अप्रैल 2002 से 31 जुलाई 2007 तक की अवधि में 89.46 लाख रुपये का कर्ज दिया.

23 फर्जी खाते खाेले : इसी तरह केएस हामिद कुटी मुसाबनी निवासी ने 31 दिसंबर 2005 को 5000 रुपये देकर खाता खोला. इसके बाद बैंक अधिकारियों ने साजिश रच कर सात जनवरी 2006 से 31 मार्च 2007 की अवधि में हामिद को 25.53 लाख रुपये का कर्ज दिया. इस राशि की वसूली नहीं हुई.

राज्य सरकार द्वारा 24 दिसंबर 2012 तक को-ऑपरेटिव बैंकों का कंप्यूटराइजेशन करने की तिथि निर्धारित करने की थी. इस बात के मद्देनजर आरोपियों ने साजिश के तहत तीन दिसंबर से 11 दिसंबर 2012 तक की अवधि में विभिन्न व्यक्तियों के नाम पर कुल 23 फर्जी खाते खोले. पहले इन खातों में कर्ज दिखाया गया. इसके बाद बैंक के दस्तावेज में इस राशि की वसूली के आंकड़े भरे गये.

यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि उमेश प्रसाद सिंह को रिटायरमेंट के बाद भी गलत तरीके से अनुबंध पर नियुक्त कर ब्रांच मैनेजर के रूप में काम लिया जा रहा था. जादूगोड़ा बैंक में हुए इस घोटाले के पर्दाफाश के बाद उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी. बैंक में हुए इस घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद सरकार ने नवंबर 2018 में ही दोषी अधिकारियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था.

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