रांची : उसूल के पक्के थे के पहले सांसद इब्राहिम अंसारी, बेटों के लिए भी पैरवी नहीं की
Updated at : 05 Apr 2019 8:16 AM (IST)
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राजकुमार लाल डोरंडा परासटोली स्थित साधारण पुश्तैनी मकान में रहता है बेटों का परिवार रांची : सन 1952 से 1957 तक संयुक्त बिहार में रांची उत्तर-पूर्वी के पहले सांसद ए. इब्राहिम अंसारी थे. 1952 से पूर्व वे 1950 से 1952 तक सांसद रहे थे. उनका परिवार आज भी एक साधारण शहरी की जिंदगी जी रहा […]
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राजकुमार लाल
डोरंडा परासटोली स्थित साधारण पुश्तैनी मकान में रहता है बेटों का परिवार
रांची : सन 1952 से 1957 तक संयुक्त बिहार में रांची उत्तर-पूर्वी के पहले सांसद ए. इब्राहिम अंसारी थे. 1952 से पूर्व वे 1950 से 1952 तक सांसद रहे थे. उनका परिवार आज भी एक साधारण शहरी की जिंदगी जी रहा है.
आज भी उनका पुश्तैनी मकान डोरंडा परासटोली में स्थित है. मकान में बदलाव के नाम पर इतना ही हुआ है कि छप्पर से खपड़ा हटा कर एसबेस्टस लगा दिया गया है, लेकिन उनकी बैठकखाने के अंदर की दीवारों में अब भी कोई बदलाव नहीं दिखता. मोटे पिलर व दीवारों में नक्काशी व अंदर तख्ता की आलमारी व कुर्सी आदि सब कुछ वहीं है.
इब्राहिम अंसारी का परिवार 1857 में शेरघाटी से रांची आया था और बाद में यहीं का होकर रह गया. वे खुद एक पढ़े-लिखे और सुलझे व्यक्ति थे. उन्होंने कोलकाता से बीए की पढ़ाई की थी, जबकि बैचलर अॉफ लॉ की पढ़ाई पटना से पूरी की. जब वह 1957 में चुनाव हार गये थे.
इसके बाद से उन्होंने रांची सिविल कोर्ट में वकालत शुरू की. अंतिम समय तक वकालत करते रहे. उसूल के पक्के इब्राहिम अंसारी सांसद रहते या राजनीति के बड़े पदों पर रहते हुए कभी भी अपने प्रभाव का गलत इस्तेेमाल नहीं किया. परिवार के सदस्यों के लिए कभी कोई पैरवी नहीं की.
वह राजनीतिक जीवन में परिवार के लोगों को हावी नहीं होने देना चाहते हैं. उनके बड़े पुत्र अधिवक्ता मुमताज अंसारी बताते हैं कि उनकी सख्त हिदायत थी कि घर के लोग पहले अपनी पढ़ाई पूरी करें फिर अपनी काबिलियत की बदौलत सियासत में आये. अधिवक्ता मुमताज अंसारी ने पिता की इच्छा के मुताबिक पहले लॉ की पढ़ाई पूरी की और अपनी पहचान बनाने के बाद राजनीति में आये. मुमताज अंसारी को 1995 में कांग्रेस ने हटिया विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया था, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाये थे.
इब्राहिम अंसारी का जन्म चार दिसंबर 1911 को रांची में ही हुआ था और मृत्यु 1978 में हुई थी. उनके पिता का नाम दिलावर अली था. स्वर्गीय इब्राहिम अंसारी की पत्नी जरीना खातून का निधन 2010 में हुआ था. उनके परिवार में तीन पुत्र और छह पुत्रियां थीं. इनमें से छोटे पुत्र परवेज अंजुम का इंतकाल हो गया है. वहीं दूसरे पुत्र बुलंद इकबाल पीएफ अॉफिस से सेवानिवृत्त हैं .
1962 में भी कांग्रेस के प्रत्याशी थे : 1957 में रांची लोकसभा सीट से लोहरदगा अलग हो गयी और रांची पूर्वी व पश्चिम एक हो गया. 1957 में वे जयपाल सिंह की पार्टी से चुनाव हार गये थे. उनकी पार्टी से मीनू मसानी खड़ा हुए थे, जो टाटा ग्रुप से संबंध रखते थे. उन्होंने उन्हें लगभग 2500 से 3000 वोट से हराया था. सन 1962 में हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें पुन: अपना उम्मीदवार बनाया था. उस साल रांची सीट से कांग्रेस के दो लोग टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन उनके हार का फासला काफी कम था.
इस कारण से पार्टी ने उन्हें फिर से चुनाव में खड़ा किया था, लेकिन वे हार गये. इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से अलग होकर वकालत की पेशा में आ गये थे. सामाजिक सेवा में भी उनकी अभिन्न रुचि थी. जिस कारण से उन्होंने डोरंडा महाविद्यालय, सेठ सीताराम सहित अन्य शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था.
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