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#Jharkhand@18years : रूमी कुमारी जिसने बाल विवाह के मिटाने के लिए छेड़ी जंग

Updated at : 22 Nov 2018 10:55 AM (IST)
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#Jharkhand@18years : रूमी कुमारी जिसने बाल विवाह के मिटाने के लिए छेड़ी जंग

-रजनीश आनंद- झारखंड राज्य का गठन हुए 18 वर्ष हो चुके हैं. इस वर्ष स्थापना दिवस के मौके पर इस बात की खूब चर्चा भी हुई कि झारखंड अब वयस्क हो चुका है और वह प्रगति के रास्ते पर ज्यादा अच्छे से अग्रसर होगा. इस बात से सबकी सहमति हो सकती है कि झारखंड अलग […]

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-रजनीश आनंद-

झारखंड राज्य का गठन हुए 18 वर्ष हो चुके हैं. इस वर्ष स्थापना दिवस के मौके पर इस बात की खूब चर्चा भी हुई कि झारखंड अब वयस्क हो चुका है और वह प्रगति के रास्ते पर ज्यादा अच्छे से अग्रसर होगा. इस बात से सबकी सहमति हो सकती है कि झारखंड अलग राज्य का निर्माण होने से प्रदेश में काफी विकास हुआ, लेकिन यह भी एक सच है, जो आंकड़ों से दिखता है कि प्रदेश के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और कई ऐसी समस्याएं प्रदेश में व्याप्त हैं, जो आम लोगों के जीवनस्तर को सुधारने में बाधक हैं. मसलन कुपोषण, पलायन और बालविवाह ऐसी समस्याएं हैं, जिनसे आम लोगों का जीवन प्रभावित है और विशेषकर महिलाएं इसकी भुक्तभोगी हैं.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार प्रदेश में 38 प्रतिशत लड़कियों का बालविवाह होता है, जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद भी यह बालविवाह पर प्रतिबंध नहीं लग पाया है. ऐसे में यह समय की मांग है कि आम लोगों को यह समझाया और बताया जाये कि बाल विवाह बाल अधिकारों का हनन है, तभी इस परंपरा पर रोक संभव है. इसी प्रयास में जुटी हैं रांची, बुढ़मू प्रखंड की रहने वाली रूमी कुमारी.कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय से 12वीं करने के बाद रूमी कुमारी ने विकास भारती, रांची से ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग ली है. वर्तमान में रूमी यहां लड़कियों को ट्रेनिंग देने का काम कर रही हैं. साथ ही लड़कियों को बाल अधिकारों के प्रति जागरूक करने बाल विवाह के प्रति आवाज उठाने के लिए प्रेरित कर रही हैं.रूमी का जीवन इतना संघर्ष की कहानी है. वह खुद इन कुप्रथाओं की शिकार रहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की है. वह बंधुआ मजदूरी करने वाले माता-पिता की संतान हैं और जब वह मात्र 9-10 साल की थीं, उसी वक्त उन्हें घरेलू कामकाज करने के लिए पटना और अन्य शहरों में एजेंट के जरिये भेज दिया गया था.रूमी का कहना है कि उसके घर के आर्थिक हालत बहुत खराब थे जिसके कारण उसे एजेंट के जरिये माता-पिता ने बाहर भेजा.

उस वक्त यह कहा गया था कि उसे काम के बदले पैसे मिलेंगे और उसकी पढ़ाई की व्यवस्था भी करा दी जायेगी. लेकिन ऐसा कुछ भी वहां पर नहीं हुआ. जिसके बाद वह किसी तरह से वहां से चली आयी. फिर किसी तरह गांव के सरकारी विद्यालय में एडमिशन करवा लिया.लेकिन गरीबी के कारण उसके माता-पिता ने 14 साल की आयु में ही उसकी शादी तय कर दी. लेकिन रूमी ने अपनी शादी का पुरजोर विरोध किया और अपने माता-पिता से कहा कि वह शादी नहीं करना चाहती बल्कि पढ़ना चाहती हैं. रूमी ने बाल विवाह की शिकार अपनी बड़ी बहन की परेशानी को देखा था, जिसके कारण वह शादी नहीं करना चाहती थी. काफी मशक्कत करने के बाद रूमी ने अपने माता-पिता को मना लिया.उसके बाद रूमी ने ब्लॉक एक्सटेंशन एजुकेशन आफिसर से मिलकर अपना कस्तूरबा विद्यालय बुढ़मू में इंरॉलमेंट कराया और 12वीं की परीक्षा दी. रूमी के अंदर नेतृत्व का गुण है, जिसके कारण उसने स्कूल में अपना प्रभाव बना लिया और उसके स्कूल में तमाम निर्णय लेने में उसकी भूमिका उल्लेखनीय हो गयी. रूमी ने अपने गांव में लोगों को बाल विवाह के प्रति जागरूक करना शुरू कर दिया और उन्हें यह भी बताया कि अपने गांव से पलायन सही नहीं है. उसके इस प्रयास का अच्छा प्रभाव देखने को मिला और वह अपने उम्र के किशोरों में प्रसिद्ध हो गयी.आज रूमी पलायन, दहेज प्रथा और बाल विवाह को रोकने के लिए प्रयासरत हैं.

इसकी शुरुआत उसने अपने घर से ही की है, जब उसके माता-पिता ने अपने 16 साल के बेटे की शादी के लिए दहेज की मांग की तो रूमी ने उनका जोरदार विरोध किया. यह विरोध दहेज के खिलाफ तो था ही अपने 16 साल के भाई की शादी का भी रूमी ने विरोध किया.रूमी को अपने इस कार्य में सपोर्ट मिला ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ संस्था का. संस्था ने रूमी का जागरूकता के इस प्रयास में काफी साथ दिया और शिक्षा के स्तर को सुधारने में भी मदद की. रूमी ने गांव की बच्चियों को स्पोकेन इंग्लिश और कंप्यूटर स्किल की ट्रेनिंग दिलवाना शुरू किया और बच्चियों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रही हैं.

जो बच्चियां स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ देती हैं, उन्हें शिक्षा जारी रखने के लिए भी रूमी प्रेरित करती हैं और उन्हें अपने प्रयासों से कस्तूरबा गांधी विद्यालय में दाखिला दिलवाती हैं.स्किल इंडिया मिशन से जुड़कर भी रूमी बेहतरीन काम कर रही हैं. वह गांव की लड़कियों को इससे जोड़ रही हैं और उन्हें बाल विवाह के चंगुल में फंसने से रोक रही हैं. रूमी का कहना है कि वह यह चाहती हैं कि लड़कियों को बेहतरीन शिक्षा मिले और वे अपने सपनों को साकार कर सकें. इसके लिए बहुत जरूरी है कि उनका जीवन बाल विवाह से अलग रहे.

रूमी ने बाल विवाह के खिलाफ सैकड़ों लड़कियों को एकजुट किया और जागरूकता का कार्य किया है, जिसके कारण उन्हें ‘अशोका यूथ वेंचर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है.रूमी कुमारी कहती हैं कि झारखंड राज्य का गठन हुए इतने वर्ष बीत गये हैं, लेकिन अभी भी हमारे राज्य में बाल विवाह और पलायन की समस्या बनी हुई है. इसे रोकना उनका लक्ष्य है, जिसके लिए वह सरकार से सहायता चाहती हैं. रूमी का कहना है कि अगर सरकार उन्हें चाइल्ड राइट के लिए काम करने वालों की सूची में मान्यता दे दे, तो उसकी बातों को ज्यादा तरजीह मिलेगी और वह हजारों बच्चों का बचपन बचा पायेंगी.

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