दुनिया भारतीय ज्ञान व परंपरा की ऋणी है

Updated at : 29 Sep 2018 2:07 AM (IST)
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दुनिया भारतीय ज्ञान व परंपरा की ऋणी है

रांची : कुछ सामाजिक समस्याअों के कारण भारतीय समाज को बिखेरने की कोशिश हो रही है. इस धंधे पर चोट के लिए संघर्ष भी हो रहा है. यह कार्यक्रम इसी का अंग है. हालांकि दुनिया भारतीय ज्ञान व परंपरा के लिए इसकी ऋणी है. कई यूरोपियन चिंतकों ने भी यह बात मानी है. पर बाद […]

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रांची : कुछ सामाजिक समस्याअों के कारण भारतीय समाज को बिखेरने की कोशिश हो रही है. इस धंधे पर चोट के लिए संघर्ष भी हो रहा है. यह कार्यक्रम इसी का अंग है. हालांकि दुनिया भारतीय ज्ञान व परंपरा के लिए इसकी ऋणी है. कई यूरोपियन चिंतकों ने भी यह बात मानी है. पर बाद में जैसा की श्री अरविंद ने कहा था भारत को पिछड़ा माना जाने लगा तथा इसकी खिल्ली उड़ायी जाने लगी. इसी भावना से अन्य धर्मावलंबियों ने हिंदुअों का धर्म परिवर्तन शुरू किया. लेखक व चिंतक प्रो शंकर शरण ने लोक मंथन कार्यक्रम के तहत समाज अवलोकन विषय पर यह बातें कही.
प्रो शरण ने कहा कि भारत बगैर किसी युद्ध व हिंसा के अपने ज्ञान व विचारों से दुनिया को लाभान्वित करता रहा है. भारतीय सभ्यता व हिंदू जाति की यही विशेषता है कि इसका लक्ष्य धर्म को संपूर्णता में जीना है. दूसरी सभ्यता या संप्रदाय की तरह यह किसी एक दिन का मामला नहीं है. रामकृष्ण मिशन के स्वामी नरसिम्हानंद ने कहा कि कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था तक हम ठीक थे.
इसमें कोई खराबी नहीं थी. पर ज्योंही हमने अपने को ब्राहम्ण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र की जाति व्यवस्था में बांटा, हमारा पतन शुरू हो गया. स्वामी ने कहा कि भारतीय समाज की रीढ़ इसकी आध्यात्मिकता है. जो हमें हाथी व बंदर की भी पूजा करते देख हंसते हैं, वे नहीं जानते कि यह हाथी व बंदर की नहीं, बल्कि उसकी पूजा है, जिसकी ये कृतियां हैं. हिंदू समाज समस्त सृष्टि की पूजा करता है.
सुविधा नहीं, फिर भी खुशहाल है आदिवासी समाज : परिचर्चा के दूसरे सत्र में समाज अवलोकन विषय पर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि लंबे कालखंड में देखें, तो हमारा समाज बदलता दिखायी देता है. पर पारिवारिक संस्कार व मूल्य तथा इसके अलावा कुछ अन्य शक्तियां इसे जोड़े हुए है. शेष भारतीय समाज आदिवासी समाज की खूबियों पर मंथन कर सकता है.
आदिवासी समाज अार्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर होते हुए भी सामाजिक दृष्टि से बहुत मजबूत है. इसके पास अपनी जरूरतों को पूरा करने की बहुत सुविधाजनक स्थिति नहीं है, पर हैपीनेस इंडेक्स (खुशहाली के पैमाने) के आधार पर यह समाज सर्वाधिक खुशहाल है. श्री मुंडा ने कहा कि पूरे भारतीय समाज में संतोष की भावना रही है.
पर उपभोक्तावाद व भोग पर आधारित यह दुनिया हमारी आत्म संतोषी विचारधारा समाप्त कर रही है. कृषि व अन्य पारंपरिक पेशे से जुड़े जनजातीय समाज की जीवन पद्धति तथा इसकी अर्थव्यवस्था साथ-साथ चलती है. इसके साथ पर्यावरण की रक्षा तथा इसके प्रति आदर का भाव भी जुड़ा है. पर उद्योगों व बाजार पर आधारित समाज का एक तबका यह सबकुछ कानून पर छोड़ देता है.
हम सब सुखी हैं, तो फिर अवलोकन क्यों कर रहे हैं : डॉ कौशल पवार ने कहा कि समाज का तीन नजरिया होता है. शास्त्रीय, व्यावहारिक व वैज्ञानिक. अगर हम सब सुखी हैं, तो फिर समाज का यह अवलोकन क्यों कर रहे हैं. आधुनिक समय में भी हम बालिका शिक्षा की बात करते हैं, इसलिए हम व्यावहारिक भी नहीं है.
डॉ पवार ने भारतीय समाज के धर्म, दर्शन तथा इसके लोक साहित्य व ज्ञान सहित वाद, विवाद व संवाद के द्वंद व विरोधाभास पर अपनी बातें कही. कहा कि मैं जातिवादी नहीं हूं, पर यह चिंतन हर किसी को करना चाहिए. डॉ राकेश मिश्र ने कहा कि आज का भारतीय समाज तीन तरह का है. एक उदारवादी, भौतिकतावादी तथा अपने अधिकार व रुचि के प्रति केंद्रित समाज है.
दूसरा भारतीय क्लास मार्क्सवाद व समाजवाद का है. इसका एक तबका चाहता है कि अधिकार व संसाधन के वितरण की शक्ति राज्य को दे दी जाये. तीसरा हमारा समाज धर्म व मोक्ष केंद्रित है. भोग इसके नियंत्रण में है. इस भारतीय दृष्टि से अलग एक सुधार की दृष्टि है. पर सवाल है कि सुधार की कसौटी क्या है? सुधारवाद के नाम पर छद्म रूप से उदारवादी व साम्यवादी विचार लाना नहीं है.
हमें सोचना होगा कि हम क्या थे अौर क्या हो गये. समाज अवलोकन विषय पर दूसरे सत्र की चर्चा से पहले इसकी प्रस्तावना रखते हुए परिचर्चा के समन्वयक उमेश उपाध्याय ने कहा कि समाज को देखने की किसी व्यक्ति की दृष्टि तथा उस व्यक्ति को देखने की समाज की दृष्टि अलग-अलग होती है. पर यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. हमारी व्यवस्था हमेशा से समाजोन्मुखी रही है, राज्योन्मुखी नहीं. इसलिए राज्य ने टीवी व मीडिया को नियंत्रित कर लिया हो, तब भी समाज अपने तरीके से चीजों को देखता है.
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