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चारा घोटाला : क्लर्क ने खोला राज, तह तक पहुंचा मामला

Updated at : 07 Jan 2018 7:41 AM (IST)
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चारा घोटाला : क्लर्क ने खोला राज, तह तक पहुंचा मामला

!!आनंद मोहन!! रांची : 1989 की बात है़ पशुपालन विभाग में बड़े घोटाले की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी़ लोगों को कानों-कान खबर नहीं थी कि अधिकारियों, नेताओं और सप्लायर-ठेकेदारों का एक गिरोह पशुपालन विभाग पर हावी हो रहा है़ साथ ही साथ सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था. भागवत झा आजाद […]

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!!आनंद मोहन!!

रांची : 1989 की बात है़ पशुपालन विभाग में बड़े घोटाले की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी़ लोगों को कानों-कान खबर नहीं थी कि अधिकारियों, नेताओं और सप्लायर-ठेकेदारों का एक गिरोह पशुपालन विभाग पर हावी हो रहा है़ साथ ही साथ सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था. भागवत झा आजाद की तब बिहार में सरकार थी. विस्कोमान में घोटाला से लेकर दूसरे सहकारी संस्थाओं में घोटाले सामने आ रहे थे़ उस समय स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सरयू राय काम कर रहे थे़ नव-भारत टाइम्स से जुड़े थे. सरयू राय तब पटना में थे. सहकारिता विभाग में घोटाले के तथ्यों को उजागर कर रहे थे.

उधर लालू प्रसाद के नाम का एक कद्दावर नेता बिहार के राजनीतिक पटल पर दस्तक दे रहा था़ मार्च 1990 में लालू प्रसाद की सरकार बिहार में सत्तारूढ़ हो चुकी थी़ एक दिन की बात है़ सरयू राय डाक बंगला चौराहे के पास सड़क पार कर रहे थे़ उन दिनों पशुपालन विभाग में एक क्लर्क थे उमेश सिंह़ सरयू राय से भी परिचित थे़ उमेश सिंह ने सरयू राय को आवाज दी, रुकने का आग्रह किया़ बातचीत शुरू हुई़ उमेश सिंह ने बताया कि कहां सहकारिता विभाग पर लगे हैं, पशुपालन विभाग में तो इससे बड़ा घोटाला चल रहा है़ उमेश सिंह की बातों में दम था़ उन्होंने पशुपालन विभाग में भ्रष्टाचार से जुड़े तार की बातें बतायी़ यहां तक कहा कि विधानसभा भी इसमें जुड़ी है़ कुछ विधायक गिरोह की मदद कर रहे है़ं उमेश सिंह ने बताया कि किस अधिकारी के पास कागजात है़ षडयंत्र के केंद्र में कौन-कौन है़ं उन्होंने तब सरयू राय को बताया कि वर्तमान में झारखंड और तत्कालीन दक्षिण बिहार इस पशुपालन घोटाले का केंद्र बिंदु है़ सरयू राय बताते हैं कि तब नहीं लगा था कि उमेश सिंह की यह सूचना आगे चल कर इतने बड़े घोटाले की शक्ल लेगा़

एक अधिकारी से लोग कागजात लेते थे, पैसे की उगाही करते, लेकिन मामला सामने लाते नहीं समय गुजर रहा था़ समय के साथ पशुपालन गिरोह में माफिया मजबूत हो रहे थे.

लालू प्रसाद की सरकार बनी, तो इनकी पैठ विभाग के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी तक हो गयी़ आरएस शर्मा एक योग्य अधिकारी थे़ पशुपालन विभाग में निदेशक बनने की योग्यता रखते थे, लेकिन इनकी ईमानदारी आड़े आ रही थी़ वह विभाग के रवैये से दु:खी थे़ सरयू राय को किसी अन्य सूत्र से जानकारी मिली कि आरएस शर्मा के पास पशुपालन विभाग के घोटाले से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज है़ं सरयू राय उनके पास पहुंचे़ आरएस शर्मा से विभाग में चल रही अव्यवस्था के बारे में जानकारी ली़ सरयू राय ने जैसे ही कुछ कागजात मांगे, तो उन्होंने कहा कि देने में कोई दिक्कत नहीं है़, लेकिन आपसे पहले बहुत लोगों ने हमसे कागजात लिये़ मेरी जानकारी है कि अधिकारियों और भ्रष्ट लोगों से उनलोगों ने उगाही भी कर ली़ सरयू राय ने शर्मा जी के दु:ख को समझ लिया़ सरयू राय ने कहा कि वह कागजात नहीं लेंगे़ मामले को सतह पर लायेंगे, फिर बात करेंगे़ आरएस शर्मा से कई जानकारी मिली़ उन सूत्रों पर घोटाले को खोलने में काफी मदद मिली़

मुख्य सचिव रहे अशोक सिंह ने की जांच, तो हो गया था तबादला
झारखंड में मुख्य सचिव रहे अशोक सिंह एक बार पशुपालन विभाग में पदस्थापित थे़ 90 के दशक की बात है अशोक सिंह तब पशुपालन विभाग में संयुक्त सचिव थे़ संयुक्त सचिव के रूप में श्री सिंह ने होटवार और हजारीबाग में पशुपालन केंद्रों की जांच की़ पहले बताया गया था कि विभाग पशुओं के लिए इन केंद्रों में पौष्टिक चारा पैदा कर रहा है़ इसके एवज में करोड़ों खर्च दिखाये गये थे़ केंद्रों में सैकड़ों की संख्या में गाय, भैंस और सांड़ भी बताये गये थे़ संयुक्त सचिव ने जब केंद्र का औचक निरीक्षण किया, तो पाया कि एक भी गाय, भैंस या सांड़ नहीं है़ कहीं कोई चारा भी पैदा नहीं किया जा रहा है़ केंद्र के लोगों ने बताया कि सभी पशु मर गये है़ं विभाग बेहिसाब पैसे खर्च कर रहा था़ एके सिंह ने जांच रिपोर्ट बनायी़ ऊपर के अधिकारी भी एके सिंह के इस रवैये से नाराज थे़ उस समय विभागीय सचिव थे के अरुमुगम़ बाद में यह आइएएस अधिकारी भी जेल गया़ विभागीय सचिव अरुमुगम ने संयुक्त सचिव एके सिंह को खूब धमकाया़ पूछा कि आप ने बिना आदेश के केंद्रों की जांच कैसे की़ एक दिन सरयू राय तब एके सिंह से मिलने उनके कार्यालय गये़ एके सिंह खुद दु:खी थे़ वह अकेले अपने चैंबर मेें बैठे थे़ सरयू राय ने पशुपालन विभाग की बात निकाली, तो उन्होंने सारी घटना बतायी़ कहा कि अब तो मैं ही यहां से जा रहा हूं, ये लोग मेरा तबादला कर रहे है़ं उस समय एके सिंह से सरयू राय को विभाग के बड़े अधिकारी किस तरह संलिप्त हैं, यह भी मालूम हुआ़ उसके बाद सरयू राय ने विभाग के बड़े अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोला.

लालू की सरकार में तीन वर्ष तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं, बाद में सच सामने आया
लालू प्रसाद की सरकार में तीन वर्षों तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं आयी. इससे पहले 1993-94 से पशुपालन विभाग में घोटाले सतह पर आने लगे थे़ सरयू राय ने इस मामले को लेकर कई स्तर पर शिकायत की़ सीएजी की रिपोर्ट जब 1995 में आयी, तो बड़े पैमाने में अनियमितता सामने आयी. इससे पूर्व सरयू राय ने लालू प्रसाद की सरकार को लेकर लोक नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती के मौके पर आरोप पत्र तैयार किया था़ इस आरोप पत्र में पशुपालन विभाग में चल रहे कई घोटाले को सामने लाया गया था़ सरयू राय ने बताया कि किस तरह सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग घोटाले में शामिल है़ंं चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी, बीस सूत्री के एक अध्यक्ष कैसे पशुपालन विभाग के माफिया सरगना बन गया है, रांची हवाई अड्डे पर हवाई जहाज रोक कर आयकर अधिकारियों ने कैसे तीन करोड़ जब्त किये, ऐसी कई घटनाओं और घोटाले का जिक्र आरोप पत्र में था़ इसके बाद भी तत्कालीन लालू प्रसाद की सरकार ने कार्रवाई नहीं की़ तत्कालीन एकीकृत बिहार ही नहीं, देश के फलक पर पशुपालन घोटाला सामाने आ चुका था.

एसआइटी बना सबूत नष्ट किये
सरयू राय बताते हैं कि काफी परेशानियों और कोशिश के बाद पशुपालन विभाग में घोटाले की सीबीआइ जांच शुरू हुई. सीबीआइ जांच शुरू हुई, तो फिर एक बार खेल शुरू हुआ. उस समय सीबीआइ के कुछ अधिकारियों की सरकार से नजदीकियां थीं. सीबीआइ ने काम शुरू किया, तो राज्य सरकार ने एसआइटी बना दी. यह एसआइटी आइवाश थी. एसआइटी सरकार मेें बैठे भ्रष्ट लोगों, अधिकारियों और माफियाओं के लिए ही काम कर रही थी. एसआइटी ने सबूत नष्ट करना शुरू किया. पशुपालन विभाग के कई कार्यालयों से महत्वपूर्ण दस्तावेज जलाये जाने लगे. कागज गायब होने लगे. हर स्तर पर भ्रष्ट लोगों को बचाने का काम शुरू हुआ.

खरे ने पकड़ा पहला घोटाला
1996 के आसपास वीएस दुबे वित्त सचिव थे. सरयू राय ने पशुपालन विभाग में अवैध निकासी को लेकर वित्त सचिव को पत्र लिखा. इस मामले में सरकार के स्तर से कार्रवाई नहीं हो रही थी. वीएस दुबे ईमानदार अधिकारी थे. गंभीरता को समझा. वित्त सचिव के रूप में उन्होंने जिला के सभी उपायुक्तों की ट्रेजरी से होने वाली निकासी की जांच के लिए एक पत्र लिखा. जिला ट्रेजरी उपायुक्त के अधीनस्थ काम करती है, इसलिए उन्होंने उपायुक्तों को जिम्मेवार बताया. तब चाईबासा में अमित खरे उपायुक्त थे. उन्होंने ट्रेजरी की जांच करायी. भारी अनियमितता पकड़ी गयी. नियम की अनदेखी कर करोड़ों की निकासी की गयी थी. अमित खरे ने एफआइआर करायी. यह घोटाले का सबसे पहला केस था. इसके बाद एक-एक कर घोटाले की परत खुलती गयी.

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