रांची : अब झारखंड के लोकायुक्त को भी जांच के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी. मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग ने महाधिवक्ता की राय का हवाला देकर लोकायुक्त के जांच के अधिकार को समाप्त करने काे लेकर संयुक्त सचिव रामा शंकर प्रसाद ने कार्मिक विभाग के प्रधान सचिव को पत्र लिखा है. इसमें लोकायुक्त अधिनियम की धारा 13(3)(1) और 2001 में निहित प्रावधान पर महाधिवक्ता से राय लिये जाने की बात कही गयी है. वहीं इसकी प्रति सभी विभागों के सचिवों और जिलों के उपायुक्तों को भेजी है.
सीएस के आदेश को कैसे बदला विभाग ने
लोकायुक्त अधिनियम की धारा 13(3)(1) में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव एमके मंडल ने 16 फरवरी 2006 काे (पत्रांक : 856) आदेश जारी किया गया था. फिर कार्मिक विभाग के तत्कालीन प्रधान सचिव आदित्य स्वरूप ने 9 फरवरी 2011 काे (पत्रांक : 217) सभी विभागों और सचिवों को पत्र लिखा था. जिसमें साफ है कि लोकायुक्त को किसी मामले में किसी एजेंसी या अफसर से जांच कराने का अधिकार है.
जांच में तथ्य सामने आने के बाद उस अाधार पर आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर अनुसंधान के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी. लेकिन मंत्रिमंडल निगरानी विभाग ने 24 जुलाई 2017 को कार्मिक विभाग को जो पत्र लिखा है उसमें सिर्फ महाधिवक्ता की राय को आधार बनाया गया है. इस पर विभागीय मंत्री और कैबिनेट अथवा मुख्य सचिव के आदेश का कोई जिक्र नहीं किया गया है.
निगरानी विभाग ने जानकारी तक नहीं दी
इसमें दिलचस्प बात यह कि इस संबंध में निगरानी विभाग ने लोकायुक्त कार्यालय को जानकारी तक नहीं दी है. उधर, विभागीय पत्र का हवाला देकर हजारीबाग डीसी ने भी जमीन संबंधी एक मामले में लोकायुक्त के अादेश पर जांच करने से पल्ला झाड़ लिया है. इस संबंध में हजारीबाग के प्रमंडलीय आयुक्त के कार्यालय से भेजे गये पत्र में खुलासा हुआ है. संयुक्त सचिव ने पत्र में कहा है कि शिकायतों की जांच कर एजेंसियों और अफसरों द्वारा जांच प्रतिवेदन सीधे लोकायुक्त को भेज दी जाती है. इसकी सूचना मंत्रिमंडल निगरानी को नहीं मिलती है. अधिकारी द्वारा कार्मिक विभाग द्वारा प्रक्रिया का निर्धारण करने और इससे संबंधित को सूचित करने का अनुरोध किया गया है.

