सारागढ़ी युद्ध दिवस पर दी गयी शहीदों को श्रद्धांजलि
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 13 Sep 2020 9:13 AM
सिख रेजिमेंटल सेंटर रामगढ़ कैंट में 12 सितंबर को 123 वां सारागढ़ी दिवस मनाया गया.
सिख रेजिमेंटल सेंटर रामगढ़ कैंट में 12 सितंबर को 123 वां सारागढ़ी दिवस मनाया गया. सरागढ़ी युद्ध स्मारक पर सिख रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट ब्रिगेडियर एम श्री कुमार (शौर्य चक्र), सेंटर के अधिकारी व जवानों ने सारागढ़ी के शहीदों को श्रद्धांजलि दी.
मौके पर रेजिमेंटल सेंटर के गुरुद्वारा साहिब में शबद कीर्तन का आयोजन किया गया. बताया गया कि 12 सितंबर 1897 का यह वीर दिवस हर पीढ़ी को प्रेरित करता है. सिख रेजिमेंट के लोग हर साल 12 सितंबर को सारागढ़ी की लड़ाई के दिन को रेजिमेंटल बैटल ऑनर डे के रूप में मनाते हैं.
सारागढ़ी का युद्ध 1897 में चार सिख के 22 सैनिकों ने लड़ा था. यह तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सेना का हिस्सा था. उत्तरी पश्चिमी सीमा प्रांत में हजारों पठान के खिलाफ सारागढ़ी की लड़ाई लड़ी गयी थी. यह लड़ाई तिराह अभियान के हिस्से के रूप में लड़ी गयी थी. इसमें ब्रिटिश भारतीय सेना उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत के जनजातीय क्षेत्रों में हावी होने का लक्ष्य बना रही थी. समाना बहुत महत्वपूर्ण जगह था.
फोर्ट लॉक हार्ट और फोर्ट गुलिस्तान नामक दो समान किले इसी रिज लाइन पर थे, लेकिन वह आपस में जुड़े नहीं थे. इसलिए सारागढ़ी के पोस्ट को इन दो किलों के बीच एक सिग्नलिंग पोस्ट के रूप में स्थापित किया गया था. इस पोस्ट का संचालन हवलदार इशर सिंह के नेतृत्व में बहादुर खालसा सैनिकों द्वारा संचालित किया जा रहा था.
उस निर्णायक दिन पर आफरीदी और ओरकजाई जनजातियों से जुड़े दस हजार से अधिक आदिवासियों ने सारागढ़ी के चौकी पर हमला कर दिया. इशर सिंह के नेतृत्व में सारागढ़ी में उच्च कमान से वापस लेने के आदेश के बावजूद उन्होंने लड़ने का फैसला किया. आखिरी गोली और आखिरी सांस तक इस लड़ाई में सभी 22 सैनिक शहीद हो गये.
उन्होंने एक इंच भी जमीन नहीं छोड़ी. सभी योद्धाओं को उनके बलिदान के लिए सर्वोच्च वीरता पुरस्कार इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया था. जब यह खबर` लंदन पहुंची, तो ब्रिटिश संसद ने नियमित कामकाज को स्थगित करते हुए उन बहादुरों को सम्मानित किया. इस लड़ाई को यूनेस्को द्वारा दुनिया की आठ सबसे प्रसिद्ध लड़ाई में से एक माना जाता है. कई देशों ने इस लड़ाई को अपने पाठ्य पुस्तकों में भी शामिल किया.
posted by : sameer oraon
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