प्रभात खबर संवाद कार्यक्रम में एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने कहा कि जेबीसीसीआइ का गठन नहीं होने से एक लाख 94 हजार मजदूर प्रभावित

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फोटो फाइल 21 आर-1 संवाद कार्यक्रम में शामिल एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार  | Prabhat Khabar Network

फोटो फाइल 21 आर-1 संवाद कार्यक्रम में शामिल एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार | Prabhat Khabar Network

एटक अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने कहा कि जेबीसीसीआई का गठन न होने से कोयला मजदूरों के वेतन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मामले लंबित हैं। केंद्र से जल्द पहल की मांग।

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रामगढ़: पूर्व सांसद सह एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने कहा कि कॉमर्शियल माइनिंग से कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है. कैप्टिव माइंस और रेवेन्यू शेयरिंग माइंस में मजदूरों एवं कर्मचारियों के हितों की अनदेखी की जा रही है. उन्होंने कहा कि जेबीसीसीआई का गठन नहीं होने से सीआईएल के अधीन कार्यरत लगभग एक लाख 94 हजार 663 मजदूर प्रभावित हो रहे हैं.

इसके कारण मजदूरों के वेतन वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा व कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय नहीं हो पा रहा है. कोल इंडिया लिमिटेड पर केंद्र सरकार की नीतियों के प्रभाव, ट्रेड यूनियनों की गतिविधियों, विभिन्न समितियों की बैठकें बंद होने सहित अन्य मुद्दों पर रमेंद्र कुमार ने प्रभात खबर रामगढ़ कार्यालय में विस्तृत बातचीत की.

जेबीसीसीआई का गठन शीघ्र होना चाहिएएटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने कहा कि वर्ष 1975 में सीआईएल के गठन के बाद पहली बार जेबीसीसीआई के गठन में इतना विलंब हो रहा है. उन्होंने बताया कि वर्तमान जेबीसीसीआई का कार्यकाल 30 जून 2026 को समाप्त हो चुका है. सीआईएल की ओर से जेबीसीसीआई के गठन का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है.

केंद्र सरकार की स्वीकृति मिलने के बाद ही जेबीसीसीआई का गठन और उसका कार्य शुरू हो सकेगा. उन्होंने कहा कि इसके अभाव में मजदूर हित से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लंबित हैं. इसका सीधा असर मजदूरों के वेतन वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाओं व पेंशन से संबंधित मामलों पर पड़ रहा है.

कॉमर्शियल माइनिंग से सीआईएल की कंपनियों को हो रहा नुकसानरमेंद्र कुमार ने कहा कि वर्ष 2021 में कॉमर्शियल माइनिंग नीति लागू होने के बाद देशभर में 350 से अधिक कॉमर्शियल और कैप्टिव माइंस का आवंटन किया जा चुका है. इसका सीधा प्रभाव सीआईएल की सभी कंपनियों पर पड़ा है. उन्होंने कहा कि कॉमर्शियल और कैप्टिव माइंस में सीआईएल की तरह मजदूरों के लिए वेतन वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा व कल्याणकारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं. वहां मजदूर हितों की रक्षा के लिए ट्रेड यूनियन के गठन की भी अनुमति नहीं है.

उन्होंने कहा कि इन माइंस में कोयले के उत्पादन और बिक्री की प्रक्रिया पूरी तरह व्यावसायिक है. मजदूर हितों की अनदेखी करते हुए कोयले की कीमत तय की जाती है, जिससे सीआईएल का कोयला अपेक्षाकृत महंगा पड़ता है और उसकी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ता है.

रमेंद्र कुमार ने कहा कि कॉमर्शियल माइनिंग नीति के विरोध में देशभर की सभी ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल भी की थी. उन्होंने केंद्र सरकार से मजदूरों और सीआईएल के हित में इस नीति की समीक्षा कर आवश्यक बदलाव करने की मांग की.

रेवेन्यू शेयरिंग माइंस निजीकरण की शुरुआत : रमेंद्र कुमार

रमेंद्र कुमार ने कहा कि सीआईएल के अंतर्गत कई कोयला खनन क्षेत्रों में रेवेन्यू शेयरिंग माइंस की व्यवस्था लागू की जा रही है. जिन कोलियरियों का संचालन सीआईएल की कंपनियां नहीं कर रही हैं, उन्हें शुद्ध लाभ के चार प्रतिशत के आधार पर निजी कंपनियों को आवंटित किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनों का मानना है कि जब सीआईएल स्वयं देश की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है, तो निजी कंपनियों को कोलियरियों का संचालन सौंपना उचित नहीं है. ऐसे सभी कोयला क्षेत्रों का संचालन सीआईएल की कंपनियों द्वारा ही किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय संपत्ति कोयला व मजदूरों के हितों की बेहतर ढंग से रक्षा हो सके.

मजदूरों को शुद्ध पेयजल तक उपलब्ध नहींएटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने कहा कि सीआईएल की सभी कंपनियों के क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों को आज भी शुद्ध पेयजल की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कहा कि स्थापना के 61 वर्ष बाद भी सीआईएल अपने मजदूरों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो सकी है. इसके अलावा अस्पताल, आवासीय क्वार्टर व अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी लगातार प्रभावित हो रही है.

सीएमपीडीआई के अस्तित्व पर संकट :

रमेंद्र कुमाररमेंद्र कुमार ने कहा कि जिन कार्यों के लिए सीएमपीडीआई की स्थापना की गई थी, उन्हीं क्षेत्रों में केंद्र सरकार ने 44 निजी कंपनियों को लाइसेंस जारी कर दिया है. इसका सीधा प्रभाव सीएमपीडीआई के कार्यक्षेत्र पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में सीएमपीडीआई के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो सकता है.

श्रम संहिता कानून मजदूर विरोधीरमेंद्र कुमार ने कहा कि नया श्रम संहिता (लेबर कोड) अलोकतांत्रिक और मजदूर विरोधी है. उनका आरोप है कि इस कानून के माध्यम से कंपनियों में ट्रेड यूनियनों के अस्तित्व को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि यदि कंपनियों में ट्रेड यूनियन ही नहीं रहेंगी, तो मजदूरों के हितों की आवाज कौन उठाएगा व उनके पक्ष में निर्णय कौन करेगा.

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कैप्टिव और कॉमर्शियल माइंस सहित निजी कंपनियों में ट्रेड यूनियन के गठन को प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है, उसी तरह मजदूरों के अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं. उन्होंने बताया कि सीसीएल में संयुक्त सलाहकार संचालन समिति की बैठक भी पिछले लगभग आठ माह से नहीं हुई है. उनका आरोप है कि लेबर कोड की आड़ में मजदूरों की समस्याओं को उठाने व उनके समाधान की प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.

पर्यावरण की चिंता सिर्फ कागजों तक सीमित

रमेंद्र कुमार ने कहा कि कोयला खनन क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण की चिंता केवल कागजों, भाषणों व औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह गई है. उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से गठित समितियां भी अब अप्रासंगिक होती जा रही हैं और उनका अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है.


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