पलामू के प्रति शिबू सोरेन का विशेष लगाव

Author Anuj singh
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पलामू के प्रति शिबू सोरेन का विशेष लगाव

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का पलामू जिला से गहरा जुड़ाव रहा है.

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मेदिनीनगर. झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन का पलामू जिला से गहरा जुड़ाव रहा है. झारखंड राज्य की स्थापना से पूर्व ही उन्होंने इस क्षेत्र को अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों का अभिन्न हिस्सा बना लिया था. पलामू प्रमंडल में पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा करने और संगठन को मजबूत करने के लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किये. चियांकी से शुरू होता था पलामू दौरा

गुरुजी जब भी पलामू आते, तो मुख्यालय मेदिनीनगर (डालटनगंज) पहुंचने से पहले चियांकी स्थित संजीव तिवारी के आवास पर विश्राम करते थे. यहीं से वे जनसभाओं और बैठकों के लिए निकलते. उस समय झामुमो की पकड़ यहां कमजोर थी, लेकिन शिबू सोरेन को विश्वास था कि संघर्ष के जरिए पार्टी को मजबूत किया जा सकता है.

पलामू को मानते थे पिछड़ा, विकास को लेकर थे प्रतिबद्ध

शिबू सोरेन ने पलामू को हमेशा एक पिछड़ा और उपेक्षित इलाका माना और इसके सर्वांगीण विकास के लिए सक्रिय भूमिका निभायी.वह न सिर्फ नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर परिचित थे, बल्कि उन्होंने स्थानीय समस्याओं को भी समझने और समाधान की दिशा में काम करने का प्रयास किया. संजीव तिवारी बताते हैं, गुरुजी ने एक बार मुझसे पूछा था, यहां महाजनी प्रथा है या नहीं. उन्होंने हर तरह की सामाजिक कुरीति से बचने की सलाह दी थी. उनकी आंखों में झारखंड राज्य की स्थापना का आत्मविश्वास साफ झलकता था. वे कहते थे, संघर्ष की लौ बुझने नहीं देंगे.

झारखंड आंदोलन में पलामू की भागीदारी सुनिश्चित की

शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य आंदोलन के दौरान पलामू के नेताओं और युवाओं को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने लोगों को बताया कि बिहार से अलग राज्य बनने पर पलामू जैसे इलाकों को कितना लाभ मिलेगा. उन्होंने गांव-गांव जाकर, व्यक्तियों से मिलकर आंदोलन में भाग लेने की अपील की. परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में लोग झामुमो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन का हिस्सा बने.

गुरुजी केवल नेता नहीं, एक विचारधारा थे

संजीव तिवारी कहते हैं, गुरुजी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे झारखंड के स्वाभिमान, संघर्ष और स्वराज के प्रतीक थे. उनका जाना झारखंड के लिए अपूरणीय क्षति है. उन्होंने हर उस व्यक्ति को सम्मान दिया, जो राज्य की आकांक्षाओं के लिए संघर्ष कर रहा था. गुरुजी के अथक प्रयास और प्रेरणा से ही वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ. उन्होंने हमेशा कहा था, हिम्मत मत हारो, विजय सुनिश्चित है और वही हुआ.

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