मन की पवित्रता व समर्पण भक्ति का प्रथम सोपान: देवी कृष्णा
Published by : Akarsh Aniket Updated At : 05 Feb 2026 9:24 PM
मन की पवित्रता व समर्पण भक्ति का प्रथम सोपान: देवी कृष्णा
भगवान परशुराम मंदिर में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान प्रतिनिधि: मेदिनीनगर पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर के रेड़मा मथुराबाड़ी स्थित नवनिर्मित भगवान परशुराम मंदिर में प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान बड़े धूमधाम से संपन्न हो रहा है. इस अवसर पर 12 कुंडीय महायज्ञ और शिव महापुराण कथा सप्ताह का आयोजन किया गया है. मंदिर परिसर में भगवान शिव के प्रिय भजन “शिवजी बाघंबर वाले, भोला बाघंबर वाले, आओ जी आओ महाराज बाघंबर वाले” की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा. श्रद्धालु गहरी श्रद्धा और भक्ति भाव से भजन का आनंद लेते रहे. वृंदावन से पधारी देवी कृष्णा प्रिया ने शिव महापुराण कथा का रसास्वादन कराया. उन्होंने जीवन में भक्ति के महत्व और उससे होने वाले लाभ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिस व्यक्ति के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव नहीं है, उसका जीवन निरर्थक हो जाता है. मानव जीवन का वास्तविक आभूषण भक्ति है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान बाहरी आडंबर को नहीं, बल्कि मन की सच्चाई और शुद्ध भाव को देखते हैं. कथा के दौरान उन्होंने एक सुंदर प्रसंग सुनाया-जैसे पिता अपने बच्चों के लिए कुछ खाने का सामान लाता है और बच्चा प्रेमपूर्वक उसका कुछ हिस्सा पिता को खिलाता है, तो पिता का हृदय प्रेम से भर जाता है. उसी प्रकार हमारे पास जो कुछ भी है, वह भगवान का ही दिया हुआ है. यदि हम उसे प्रेमपूर्वक भगवान को अर्पित करते हैं, तो वे हमारे भाव से प्रसन्न होते हैं. परमात्मा से अटूट प्रेम, श्रद्धा और समर्पण ही भक्ति का वास्तविक स्वरूप है. उन्होंने कहा कि जब संसार में अधर्म और अन्याय बढ़ता है, तब भगवान शिव स्वयं धर्म और भक्तों की रक्षा करते हैं. भक्ति में अपार शक्ति है, जो समाज और संसार की दिशा बदल सकती है. उन्होंने सुख और आनंद के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि सुख भौतिक और क्षणिक होता है, जबकि आनंद आध्यात्मिक और स्थायी है. इच्छाओं की पूर्ति से मिलने वाला सुख अस्थायी है, लेकिन ईश्वर से जुड़ने पर मिलने वाला आनंद शाश्वत होता है. धर्मशास्त्रों में इसे परमानंद कहा गया है, जो निष्काम भक्ति से ही प्राप्त होता है. देवी कृष्णा प्रिया ने कहा कि सुख बाहर खोजने की वस्तु है, जबकि आनंद भीतर आत्मसाक्षात्कार से मिलता है. सुख का विलोम दुख है, लेकिन आनंद का कोई विलोम नहीं होता. जो लोग भगवान के चरणों में शुद्ध भाव से भक्ति करते हैं, उनके जीवन में सच्चा आनंद होता है. मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य परमानंद की प्राप्ति है, जो शाश्वत और स्थायी है.
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