सरकारी तंत्र के खिलाफ एकजुट हुए बीआरपी अौर सीआरपी

Updated at : 30 Jul 2018 2:09 AM (IST)
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सरकारी तंत्र के खिलाफ एकजुट हुए बीआरपी अौर सीआरपी

मेदिनीनगर : झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा बीआरपी व सीआरपी की नियुक्ति की गयी थी, ताकि सर्वशिक्षा अभियान को गति दिया जा सके. झारखंड में बीआरपी- सीआरपी की संख्या करीब 3000 है. 13 वर्षों से बीआरपी- सीआरपी राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता की देखरेख व शिक्षात्मक गतिविधियों का अनुश्रवण करते आ रहे है. लेकिन इनकी […]

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मेदिनीनगर : झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा बीआरपी व सीआरपी की नियुक्ति की गयी थी, ताकि सर्वशिक्षा अभियान को गति दिया जा सके. झारखंड में बीआरपी- सीआरपी की संख्या करीब 3000 है. 13 वर्षों से बीआरपी- सीआरपी राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता की देखरेख व शिक्षात्मक गतिविधियों का अनुश्रवण करते आ रहे है.
लेकिन इनकी माली हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. अपनी मांगों को लेकर चरणबद्ध आंदोलन चलाने के बाद भी सरकार की उदासीन रवैया से तंग आकर बीआरपी- सीआरपी ने त्राहिमाम संदेश भेजने का निर्णय लिया है. रविवार को प्रेस कांफ्रेंस में बीआरपी-सीआरपी महासंघ ने 13 वर्षों से सरकारी तंत्र द्वारा किये जा रहे शोषण व अत्याचार के प्रमाण स्वरूप पत्रिका जारी किया. प्रेस कांफ्रेंस में महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष पंकज शुक्ला, जिलाध्यक्ष किशोर कुमार दुबे, अरुण मिश्रा, मुकेश तिवारी, संतोष कुमार सिंह, प्रभात रंजन दुबे आदि ने कहा कि बीआरपी-सीआरपी अपने दायित्व का निर्वह्न पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ कर रही है.
13 वर्षो तक शिक्षा विभाग में अपनी सेवा देने के बावजूद अभी तक उनके हितों के लिए राज्य सरकार द्वारा किसी प्रकार की नियमावली तैयार नहीं की गयी है. सरकार व शिक्षा विभाग हमेशा उन्हें उपेक्षित नजर से देखती है. एक ही राज्य में दो तरह की नीति चल रही है. अन्य कर्मियों को राज्य सरकार सम्मान जनक वेतन, भत्ता अन्य सुविधा दे रही है. लेकिन बीआरपी- सीआरपी बिना किसी भत्ता के अल्प मानदेय पर सेवा करने को विवश है. इनकी विवशता व परेशानी को सरकार नही समझ रही है.
इस कारण महासंघ ने यह तय किया है कि राज्य सरकार की दोहरी नीति उदासीन व ढुलमुल रवैया तथा अपनी पीड़ा से देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री, मानवाधिकार आयोग, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को त्राहिमाम संदेश भेजकर अवगत कराया जायेगा. ताकि उन्हें भी सम्मान पूर्वक जिंदगी जीने के लिए सरकार कोई ठोस निर्णय
ले सके.
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