मैथिल नवविवाहिताओं का मधुश्रावणी व्रत भक्तिभाव से संपन्न

Updated at : 07 Aug 2024 4:53 PM (IST)
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मैथिल नवविवाहिताओं का मधुश्रावणी व्रत भक्तिभाव से संपन्न

मैथिल नवविवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाने वाला मधुश्रावणी व्रत भक्तिभाव से संपन्न हुआ. श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी से शुक्ल पक्ष तृतीया तक यह व्रत किया जाता है.

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पाकुड़ नगर. मैथिल नवविवाहित स्त्रियों द्वारा मनाया जाने वाला मधुश्रावणी व्रत बुधवार को पूरे भक्तिभाव से संपन्न हुआ. श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी से श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया तक यह व्रत नवविवाहित स्त्रियों द्वारा किया जाता है. सोलह श्रृंगार कर नवविवाहिताएं पति की दीर्घायु की कामना से यह व्रत संपन्न करती हैं. इस पूजा को महिला पुरोहित करवाती हैं. इस व्रत में पति की लंबी उम्र के लिए भगवान शंकर, माता गौरी एवं नाग देवता की पूजा की जाती है. पारंपरिक व्रत को नवविवाहिताएं मायके में करती हैं, परंतु संपूर्ण पूजा सामग्री, विवाहितों के खाने–पीने का सभी सामान, मायके के पूरे परिवार हेतु नये वस्त्र आदि ससुराल से आने का रिवाज आज तक कायम है. पूजा के दौरान महिला पुरोहित द्वारा चौदह दिन तक भगवान शंकर, माता पार्वती, नाग देवता आदि की कथाओं को सुनाकर सुखमय वैवाहिक जीवन जीने की कला सिखायी जाती है. नवविवाहित वीणा झा बताती हैं कि श्रावण मास में हमारे समुदाय की नवविवाहिताओं द्वारा इस पूजा को किए जाने का बहुत महत्व है. यह पूजा पुरातन काल से पारंपरिक तरीकों से होता आया है. मधुश्रावणी व्रत पति की दीर्घायु एवं सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है.

टेमी दागने की रस्म के साथ हुआ व्रत संपन्न :

समापन के दिन टेमी दागने की रस्म अदा की जाती है. इसमें घुटने एवं पांव पर छिद्रयुक्त पान का पत्ता रखकर जलते हुए घी की बाती रख दी जाती है, जिससे एक निशान बन जाता है. इस निशान को अचल सुहाग का प्रतीक माना जाता है. चौदह दिन चलने वाले इस व्रत में नवविवाहिताएं दिन में फलाहार एवं रात्रि में बिना नमक के अरवा भोजन करती हैं तथा इन चौदह दिनों में महादेव, गौरी, गणेश एवं नाग देवता की अलग-अलग कथा का वर्णन किया जाता है.

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