नक्सली खौफ के कारण देर से पहुंची पुलिस

Published at :17 Jul 2013 3:41 AM (IST)
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नक्सली खौफ के कारण देर से पहुंची पुलिस

।। लिट्टीपाड़ा से संजीत मंडल ।। पाकुड़ : पाकुड़ के लिट्टीपाड़ा प्रखंड मुख्यालय से आठ किमी दूर बीहड़ जंगल के बीच है लबदा गांव. इसी गांव में इसीआइ मिशन स्कूल है. यह इलाका दिन में भी भयावह लगता है. यहां का जंगल नक्सलियों के लिए सेफ जोन है. मिशन स्कूल में मात्र चार पुरुष और […]

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।। लिट्टीपाड़ा से संजीत मंडल ।।

पाकुड़ : पाकुड़ के लिट्टीपाड़ा प्रखंड मुख्यालय से आठ किमी दूर बीहड़ जंगल के बीच है लबदा गांव. इसी गांव में इसीआइ मिशन स्कूल है. यह इलाका दिन में भी भयावह लगता है. यहां का जंगल नक्सलियों के लिए सेफ जोन है.

मिशन स्कूल में मात्र चार पुरुष और एक महिला शिक्षिका हैं. कोई गार्ड और ही सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम. हॉस्टल के आसपास आधा किमी दूर तक कोई गांव है और ही कोई घर.

पुलिस तो दिन में भी इस इलाके में जाने से कतराती है. इस कारण पुलिस रात को घटनास्थल पर नहीं पहुंची. रविवार की रात दुष्कर्मियों ने इन्हीं चीजों को ध्यान में रख कर घटना को अंजाम दिया. अपराधी बेखौफ होकर हॉस्टल में घुसे और चार छात्राओं को उठा कर जंगल में ले गये. रात को भय के कारण इन छात्राओं की मदद के लिए भी कोई नहीं आया.

किसी तरह स्कूल के शिक्षक ही गांव गये और ग्रामीणों को खबर की. तब सभी घटनास्थल तक पहुंचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. ग्रामीणों के सामने मजबूरी थी कि रात को अस्पताल नहीं ले जा सकते थे, क्योंकि इन जंगलों में नक्सलियों का भय भी ग्रामीणों को रहता है.

लोग सुबह होने का इंतजार करते रहे. घटना के संबंध में पुलिस को रात को ही सूचना मिल गयी थी. पर पुलिस सुबह करीब आठ बजे घटनास्थल पर पहुंची. सूत्रों के अनुसार, रात को पुलिस को इस बात का अंदेशा था कि कहीं नक्सली उन्हें ट्रैप करने के लिए कोई जाल तो नहीं बिछा रहे हैं. पुलिस नक्सल प्रभावित इलाकों में रात को मूवमेंट नहीं करती.

सूचना मिलने पर भी फूंकफूंक कर कदम उठाती है. यहां भी यही हुआ.

सभी अपराधी आदिवासी समुदाय के ही : लिट्टीपाड़ा गैंग रेप में जिन दुष्कर्मियों का नाम आया है. ये सभी कोई बाहरी नहीं हैं और ही शहरी इलाके से इनका कोई वास्ता है. सभी आदिवासी समुदाय से ही आते हैं.

लोगों की मानें तो यदा कदा ये लोग आनेजाने के लिए भाड़े के वाहनों का उपयोग करके शहर घूम आया करते हैं. लेकिन मोबाइल रखने का शौक सभी को है. मोबाइल के जरिए आधुनिकता का प्रभाव जरूर पड़ा है.

सभी के सभी युवा हैं. ये हैं देवीलाल मुमरू, मरांग सोरेन, बोरो सोरेन, ताला हांसदा, मनोज हांसदा, बागान सोरेन, सोनाराय मुमरू, श्रीनाथ मरांडी. सभी आदिवासी हैं. इनकी उम्र भी 16 से 22 वर्ष के बीच ही है. कोई मिडिल स्कूल तो कोई हाइ स्कूल में शिक्षा ले रहे हैं.

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