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इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी का स्वास्थ्य जांच शिविर लोहरदगा : इंडियन रेड क्रास सोसाइटी के तत्वावधान में राजकीय मध्य विद्यालय में गठिया वायवात संबंधी रोगों के इलाज के लिए स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि सिविल सजर्न डॉ एमएम सेनगुप्ता, डॉ देवनीस खेस्स, डॉ आइलिन ने संयुक्त रुप से […]

इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी का स्वास्थ्य जांच शिविर
लोहरदगा : इंडियन रेड क्रास सोसाइटी के तत्वावधान में राजकीय मध्य विद्यालय में गठिया वायवात संबंधी रोगों के इलाज के लिए स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि सिविल सजर्न डॉ एमएम सेनगुप्ता, डॉ देवनीस खेस्स, डॉ आइलिन ने संयुक्त रुप से दीप प्रज्जवलित कर किया.
कार्यक्रम की शुरुआत मध्य विद्यालय की छात्राओं ने स्वागत गान गाकर किया. मुख्य अतिथि का स्वागत मलय दत्ता, नसीम अख्तर ने बुके देकर किया. कार्यक्रम में स्वागत भाषण देते डॉ आइलिन ने कहा कि लोहरदगा जिला गरीब आदिवासी बहुल जिला है.
यहां के मरीज बाहर जाकर महंगी इलाज कराने में असमर्थ हैं. वैसे मरीजों के लिए नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था के लिए हमेशा इंडियन रेडक्रास सोसाइटी तत्पर रहती है. सोसाइटी मानव सेवा के लिए ही बनाया गया है. मुख्य अतिथि सिविल सजर्न एमएम सेनगुप्ता ने कहा कि मरीजों को थोड़ा दर्द सहने की आदत बनाना चाहिए. लोग थोड़ा भी दर्द होने पर पेन किलर का उपयोग करते हैं. जो घातक साबित होता है. लोगों को दर्द की दवा तुरंत नहीं खानी चाहिए. लोगों को सहनशक्ति बढ़ाने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि इंडियन रेडक्रास सोसाइटी का मानव सेवा सराहनीय है.
डॉ देवनीस खेस्स गठिया वायवात के विशेषज्ञ ने बताया कि गठिया मुख्यतया मांस एवं चमरा में सूजन से प्रारंभ होता है. मांस के सफेद ङिाल्ली में इसके लक्षण पाये जाते हैं. गठिया खून की नली से लेकर आंत, फेफड़ा या शरीर के किसी भी अंग में होता है. चिकनगुनिया होने के उपरांत भी इस बीमारी का प्रकोप बढ़ता है. उन्होंने बताया कि यदि मरीज लगभग डेढ़ महीने तक आराम करे तो यह बीमारी स्वत: कम हो जाती है. यह लाइलाज बीमारी नहीं है.
निरंतर दवा लेने से बीमारी ठीक किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि चिकनगुनिया को लोग दैवीय प्रकोप भी मानते हैं,लेकिन यह एक बीमारी है. श्री खेस्स ने बताया कि गठिया का इलाज तीन चरण में होता है. यहां बीमारी के अनुपात में विशेषज्ञों की कमी है. गठिया से फे फड़ा, ह्रदय, किडनी, लिवर प्रभावित हो सकते हैं. चिकित्सा शिविर में बायोमैट्रिक्स टेस्ट का भी नि:शुल्क व्यवस्था विशेषज्ञों द्वारा की गयी. शिविर में पाया गया कि 40 से 50 आयु वर्ग के लोगों में आस्टोफेनिक की बीमारी है. 50 वर्ष से पर आयु वर्ग के लोगों में भी यह बीमारी पायी जाती है किंतु कम अनुपात में होती है.
शिविर में बताया गया कि झोला छाप डॉक्टरों से इलाज न करायें. झोला छाप डॉक्टर पेन किलर देते हैं जो घातक सिद्ध होता है. मंच का संचालन किशोर कुमार वर्मा ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन सीताराम शर्मा द्वाराकिया गया. शिविर को आयोजित करने में मलय दत्ता, नसीम अख्तर, प्रो स्नेह कुमार, आलोक कुमार, अरुण राम, राहुल कुमार, तरुण कुमार, जगतपाल केसरी, संदीप पोद्दार, बबलू वर्मा का योगदान सराहनीय रहा.
Prabhat Khabar Digital Desk
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