आया मौसम महुआ चुनने का

Updated at : 10 Apr 2015 9:26 AM (IST)
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आया मौसम महुआ चुनने का

गारू (लातेहार) : महुआ चुनने का मौसम आ गया. ग्रामीणों के लिए दो महीने का सीजन महुआ चुनने का है. यह उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है. मार्च, अप्रैल एवं मई महीने का बेसब्री से इंतजार ग्रामीणों को रहता है. महुआ चुनना, सुखाना उनका मुख्य कार्य है. अप्रैल का महीना है. लातेहार जिले के […]

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गारू (लातेहार) : महुआ चुनने का मौसम आ गया. ग्रामीणों के लिए दो महीने का सीजन महुआ चुनने का है. यह उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है. मार्च, अप्रैल एवं मई महीने का बेसब्री से इंतजार ग्रामीणों को रहता है. महुआ चुनना, सुखाना उनका मुख्य कार्य है. अप्रैल का महीना है.
लातेहार जिले के सरयू, कबरी, कोने, झौरया, हरातू, बारेसाठ, लात, चुंगरु, अंबाटीकर, पाल्हैया, बंदुआ आदि गांवों के ग्रामीण सुबह चार बजे ही घर वार छोड़ कर सपरिवार बाल बच्चों के संग महुआ पेड़ के नीचे देखे जा रहे हैं. महुआ चुनने में प्रतिदिन के मजदूरी के बराबर महुआ मिले या न मिले, मगर महुआ चुनना छोड़ दूसरा कार्य ग्रामीण नहीं करते. महुआ चुनना एवं इसके बाद सरहुल मनाना उनकी संस्कृति में शामिल है.
गारू प्रखंड के समध टोला, हेसाग गांवों की महिलाएं आठ से दस किमी पैदल प्रतिदिन चल कर अचार पहाड़ पर जाकर महुआ चुनती हैं. ग्रामीण महिला सुंगती देवी, मधुरी देवी, ग्रामीण रामसुंदर भगत, नारायण सिंह, शंभू उरांव, अनिल सिंह ने बताया कि सुबह से लेकर तपती धूप में भी महुआ इसलिए चुन रहे हैं ताकि वे अपना घर बना सके. कुछ ने बेटे-बेटी की शादी भी महुआ बेच कर करने की बात कही. महुआ का सीजन मार्च से मई के प्रथम सप्ताह तक होता है. ग्रामीण महुआ चुनते हैं. तो महुआ खाते भी हैं. दिन भर तपती धूप व भूख की चिंता महुआ चुनने के जुनून में काफूर हो जाती है.
ग्रामीणों ने बताया कि फरवरी व मार्च महीने में आंधी-बारिश ने महुआ को क्षति पहुंचायी. इससे पर्याप्त महुआ नहीं गिर रहा है. कम महुआ गिरना (आना) भी ग्रामीणों के चेहरे से स्पष्ट हो जाता है. फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण घर में नहीं मिलेंगे. वे महुआ पेड़ के नीचे ही मिलेंगे. महुआ का मौसम आते ही ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या नदारद हो जाती है. अभिभावक स्कूल भेजने की बजाय महुआ चुनने के लिए अपने-अपने बच्चों को भेजने पर प्राथमिकता देते हैं.
परिणाम स्वरूप ग्रामीण इलाके के स्कूलों में बच्चों की संख्या आधी से भी कम, कहीं -कहीं नाममात्र के देखे जा रहे हैं. महुआ चुन कर, बेच कर बच्चे कॉपी कलम, कपड़े एवं गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले फीस चुकाते हैं. महुआ से बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक का एक ही सपना संजोये रखते हैं.
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