बिरसा की जन्मभूमि खूंटी के 19 साल पूरे, इतिहास, संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता से बनी अलग पहचान

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खूंटी समाहरणालय | Prabhat Khabar Network

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आज खूंटी जिला अपना 19वां स्थापना दिवस मना रहा है. जानिए बिरसा मुंडा की जन्मस्थली खूंटी के इतिहास, विकास और पर्यटन स्थलों के बारे में खास जानकारी.

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खूंटी. भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली और आदिवासी-मूलवासी अस्मिता, संघर्ष तथा संस्कृति की पहचान रखने वाला खूंटी जिला आज अपने गठन के 19 वर्ष पूरे करेगा. 12 सितंबर 2007 को रांची जिले से अलग होकर खूंटी झारखंड का 23वां जिला बना था.

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तब से लेकर अब तक जिले ने प्रशासनिक, शैक्षणिक, सड़क, स्वास्थ्य, पर्यटन और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कई बदलाव देखे हैं. स्थापना दिवस जिले के इतिहास, उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं को याद करने का अवसर है.

रांची से अलग होकर बना था 23वां जिला

खूंटी पहले रांची जिले का अनुमंडल था. प्रशासनिक सुविधा और क्षेत्र के विकास को गति देने के उद्देश्य से 12 सितंबर 2007 को इसे अलग जिला बनाया गया. खूंटी दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल का हिस्सा है और राजधानी रांची से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. वर्तमान में जिले में एक अनुमंडल, छह प्रखंड, 86 पंचायतें और 756 गांव हैं.

छह प्रखंडों में खूंटी, कर्रा, मुरहू, तोरपा, रनिया और अड़की शामिल हैं. जिला प्रशासन की संरचना मजबूत होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक सरकारी योजनाओं और सेवाओं की पहुंच बढ़ी है. उपायुक्त जिले के सामान्य प्रशासन, राजस्व, विकास कार्य, कानून-व्यवस्था और निर्वाचन संबंधी कार्यों की जिम्मेदारी संभालते हैं.

बिरसा की जन्मभूमि होने से अलग पहचान

खूंटी की सबसे बड़ी पहचान भगवान बिरसा मुंडा से जुड़ी है. जिले के अड़की प्रखंड अंतर्गत उलिहातू गांव के भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन, शोषण और अन्याय के खिलाफ उलगुलान का नेतृत्व किया.

उनके संघर्ष ने आदिवासी समाज में अधिकार, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा की चेतना को मजबूत किया. बिरसा की जन्मभूमि होने के कारण खूंटी का नाम झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के आदिवासी इतिहास में भी विशेष महत्व रखता है.

उलिहातु और डोंबारी बुरु आज भी बिरसा आंदोलन की स्मृतियों को जीवंत रखते हैं. उलीहातु में बिरसा मुंडा की जन्मस्थली है, जबकि डोंबारी बुरु उलगुलान के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में जाना जाता है. ये दोनों स्थल जिले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं.

जनजातीय बहुल जिला, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

2011 की जनगणना के अनुसार खूंटी जिले की आबादी 5,31,885 थी. इसमें अनुसूचित जनजाति की आबादी 73.25 प्रतिशत है. जिले की 91.55 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है.

मुंडा और उरांव सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों की परंपराएं यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. सरहुल, करमा, सोहराय, मागे और बाहा जैसे पर्व यहां की सांस्कृतिक जीवनशैली को दर्शाते हैं. पारंपरिक नृत्य, गीत, मांदर और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ मनाये जाने वाले पर्व सामुदायिक एकजुटता की मिसाल हैं.

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जलप्रपात और प्राकृतिक सुंदरता से पर्यटन की संभावना

खूंटी को झरनों की भूमि के रूप में भी पहचान मिलती है. पंचघाघ, पेरवाघाघ और रानी फॉल सहित कई प्राकृतिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. बनई नदी से निर्मित पंचघाघ जलप्रपात जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर है. पांच धाराओं के कारण इसका प्राकृतिक स्वरूप विशेष आकर्षण पैदा करता है.

इसके अलावा लतरातू डैम और जलाशय, उलुंग फॉल, चंचला घाघ, सातधारा, रानी फॉल, रीमिक्स फॉल सहित कई प्राकृतिक स्थल पर्यटन की संभावनाओं को बढ़ाते हैं. धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से अमरेश्वर धाम-अंगराबाड़ी भी महत्वपूर्ण है. यहां स्वयंभू शिवलिंग के प्रति लोगों की गहरी आस्था है और सावन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. विकास के साथ चुनौतियां भी

जिले के गठन के बाद प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ

जिले के गठन के बाद प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ है, लेकिन ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण विकास की अपनी चुनौतियां भी हैं. बड़ी आबादी आज भी कृषि और वनोपज पर निर्भर है. धान, मक्का और दलहन की खेती के साथ लाह, महुआ, साल बीज, तेंदूपत्ता और बांस जैसे लघु वनोपज ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं.

वर्षा आधारित कृषि के कारण सिंचाई और जल संरक्षण आज भी महत्वपूर्ण विषय हैं. स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा, रोजगार, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, पर्यटन आधारभूत संरचना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाना आने वाले वर्षों में जिले के विकास की प्रमुख जरूरतों में शामिल है.

19 साल में बदली खूंटी की तस्वीर

2007 में जब खूंटी जिला बना था, तब इसके सामने एक नए जिले के रूप में प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने की बड़ी चुनौती थी. 19 वर्षों में जिला प्रशासन, पंचायत व्यवस्था, पुलिस-प्रशासन, सड़क संपर्क और विभिन्न सरकारी सेवाओं का विस्तार हुआ है. आज खूंटी की पहचान केवल एक प्रशासनिक जिला होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिरसा मुंडा की जन्मभूमि, आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक पर्यटन और ऐतिहासिक विरासत के केंद्र के रूप में भी स्थापित हो चुका है.

कई सपने आज भी अधूरे

खूंटी जिला के स्थापना के समय से ही खूंटी को नॉलेज सिटी के रूप में बसाने का सपना देखा गया. जिला घटना के 19 वर्ष पूरा होने के बाद भी यह सपना अधूरा है. नॉलेज सिटी की भूमि में रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय बनाने की शुरूआत की गयी थी लेकिन वह भी अधूरा ही रह गया. इसी तरह खूंटी में बाईपास बनाने, रेलवे लाइन से जोड़ने का सपना भी पूरा नहीं हो सका. खेल के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद खेल नगरी के रूप में भी खूंटी विकसित नहीं हो सकी है.


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फैक्ट फाइल

जिला गठनः12 सितंबर 2007 झारखंड का क्रमः 23वां जिला मूल जिलाः रांची प्रमंडलः दक्षिण छोटानागपुर अनुमंडलः 1, खूंटी सदर प्रखंडः 6 पंचायतः 86 गांवः 756 2011 की जनसंख्याः 5,31,885 अनुसूचित जनजाति आबादीः 73.25 प्रतिशत प्रमुख ऐतिहासिक स्थलः उलीहातू, डोंबारी बुरु प्रमुख पर्यटन स्थलः पंचघाघ, पेरवाघाघ, रानी फॉल, लतरातू, रीमिक्स फॉल प्रमुख धार्मिक स्थलः आमरेश्वर धाम-अंगराबाड़ी, सोनमेर मंदिर

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