jamshedpur news : जंगल की आग पर लगाम, ग्रामीणों को मिला रोजगार

Published by : AKHILESH KUMAR Updated At : 04 Feb 2026 4:00 AM

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जमशेदपुर (फाइल फोटो)

पश्चिम सिंहभूम के जंगलों में आग की घटनाओं में 30-35 फीसदी तक आयी कमी

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वन विभाग की शाल पत्तों से पत्तल व बायो-ईंधन की ईंट बनाने की पहल ला रही रंग

पश्चिम सिंहभूम के जंगलों में आग की घटनाओं में 30-35 फीसदी तक आयी कमी

jamshedpur news :

आग लगने से कोल्हान में हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल बरबाद होती है, लेकिन पश्चिम सिंहभूम जिले में वन विभाग की एक अनोखी और सामुदायिक पहल ने इस गंभीर समस्या पर काफी हद तक काबू पाने में सफलता हासिल की है. शाल पत्तों से पत्तल व बायो-ईंधन की ईंट बनाने की इस मुहिम के जरिये न सिर्फ जंगल की आग की घटनाओं में 30 से 35 फीसदी तक की कमी आयी है, बल्कि करीब 150 ग्रामीणों को सीधे तौर पर रोजगार भी मिला है. वर्ष 2024 में पश्चिम सिंहभूम में जंगल की आग की 504 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2025 में इनमें करीब 30 फीसदी की कमी आयी और केवल 208 बार आग लगने की सूचना मिली.यह पहल पश्चिम सिंहभूम जिले के पोड़ाहाट वन क्षेत्र में शुरू की गयी है, जिसे सुदूर सारंडा जंगल के बंदगांव, गुदड़ी, गोइलकेरा समेत अन्य इलाकों में लागू किया गया है. इसके तहत स्थानीय ग्रामीणों को जंगल की आग से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक किया गया और उन्हें जंगल संरक्षण की प्रक्रिया से जोड़ा गया. वन विभाग ने ग्रामीणों को शाल के पत्ते चुनने के काम में लगाया है. इसके लिए उन्हें मशीनें उपलब्ध करायी गयी हैं. फिलहाल इस क्षेत्र में 21 मशीनें लगायी गयी हैं, जिनकी मदद से ग्रामीण शाल पत्तों से पत्तल तैयार कर रहे हैं. इन पत्तलों का इस्तेमाल वन विभाग अपने स्तर पर करता है, वहीं इनकी खरीद-बिक्री स्थानीय बाजारों में भी हो रही है. शाल पत्तों के संग्रह से जंगल में प्राकृतिक फायर लाइन बन जाती है, जिससे आग के फैलने की संभावना कम हो जाती है.इसके अलावा ग्रामीणों को जंगल में गिरे सूखे पत्तों को इकट्ठा करने का काम भी दिया गया है. इन पत्तों में गोबर मिलाकर बायो-ईंधन की ईंट तैयार की जाती है. यह ईंधन घरों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है और पश्चिम सिंहभूम के कई होटलों में भी इसकी मांग है. वन विभाग अपने गेस्ट हाउसों में भी इसी प्राकृतिक ईंधन का उपयोग कर रहा है, जिससे लकड़ी पर निर्भरता कम हो रही है.

पोड़ाहाट वन क्षेत्र के डीएफओ नीतिश कुमार के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य जंगल को आग से बचाने के साथ-साथ ग्रामीणों को आजीविका उपलब्ध कराना है. भविष्य में गांवों में गैस चूल्हों की उपलब्धता बढ़ाने की भी योजना है, ताकि जलावन के लिए लकड़ी पर निर्भरता पूरी तरह खत्म की जा सके. इस प्रयास से जंगल संरक्षण और ग्रामीण विकास, दोनों को मजबूती मिल रही है.

रोज की मजदूरी के साथ बिक्री से अतिरिक्त आमदनी भी

इस योजना से जुड़े करीब 150 महिला और पुरुषों को प्रतिदिन 422 रुपये की मजदूरी दी जाती है. इसके अलावा पत्तल और बायो-ईंधन ईंट की बिक्री से होने वाली अतिरिक्त आय भी आपस में बांटी जाती है.

:::::: ऐसे बनती है बायो-ईंधन ईंट ::::::

सूखी पत्तियों का संग्रहण और सफाई

जंगल की जमीन पर गिरी हुई सूखी पत्तियों को एकत्र किया जाता है. इसके बाद इनमें मौजूद मिट्टी, कंकड़ और अन्य अशुद्धियों को अलग कर साफ किया जाता है.

पत्तियों की कतरन

साफ की गयी पत्तियों को लीफ श्रेडर मशीन की मदद से 2 से 5 मिलीमीटर आकार के महीन टुकड़ों में काटा जाता है, ताकि मिश्रण एकसार बन सके.

मिश्रण तैयार करना

कटे हुए पत्तों के चूरे को गीले गोबर के साथ 2:1 के अनुपात में मिलाया जाता है.

(लगभग 1 किलो सूखी पत्तियां : 500 ग्राम गीला गोबर)

ईंट का निर्माण

तैयार मिश्रण को मैन्युअल प्रेस ब्रिकेटिंग यूनिट में डाला जाता है और दबाव देकर 8 इंच × 5 इंच × 3 इंच आकार की ईंटें तैयार की जाती हैं.

सुखाने की प्रक्रिया

निर्मित बायो-ईंधन ईंटों को धूप या छायादार स्थान पर 12 से 14 घंटों तक सुखाया जाता है, जिससे उनमें नमी पूरी तरह कम हो जाये.

भंडारण

पूरी तरह सूख जाने के बाद बायो-ईंधन ईंटों को सूखे और हवादार स्थान पर सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जाता है, ताकि उपयोग के समय उसकी गुणवत्ता बनी रहे.

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