PHOTOS : गुमला के चैनपुर में स्कूली छात्राओं से ढुलाई गयी चावल की बोरी, वीडियो हुआ वायरल

गुमला के चैनपुर स्थित झारखंड आवासीय विद्यालय की छात्राओं से चावल की बोरी सिर पर ढुलाया जा रहा है. स्कूल तक सड़क नहीं रहने के कारण एक किलोमीटर दूर ट्रक को खड़ा कर यहां से चावल की बोरी की ढुलाई स्कूली छात्राओं से करायी गयी. बकायदा वार्डेन इस कार्य को सही मान रही है.

गुमला, दुर्जय पासवान : गुमला जिला के झारखंड आवासीय विद्यालय, चैनपुर द्वारा शिक्षा के अधिकार के नियमों की धज्जियां उड़ाने का मामला प्रकाश में आया है. स्कूली छात्राओं से चावल की बोरी ढुलाई करायी गयी है. छात्राएं पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर सिर में चावल की बोरी लादकर एक किमी तक पैदल चली है. वहीं, जब स्कूल प्रबंधन से इस संबंध में बात की गयी, तो इसी प्रकार छात्राओं से काम कराते रहने की बात कही गयी है.

आरोप है कि स्कूल की वार्डेन लिली ग्रेस द्वारा एक किलोमीटर दूर से स्कूली छात्राओं से सिर पर चावल की बोरी की ढुलाई करायी गयी. स्कूल कैंपस तक ट्रक घुसने के लिए सड़क नहीं होने के कारण ट्रक सड़क पर ही खड़ी कर दी गयी. सड़क से स्कूल तक चावल ढोने के लिए मजदूरों की जगह स्कूली छात्राओं से ही इस काम को कराया गया. यहां तक कि ट्रक से भी छात्राओं ने ही मजदूर की तरह चावल की बोरी भी उतारी है. इसके बाद सिर पर चावल की बोरी को रखकर स्कूल के गोदाम तक ले गये.

मालूम हो कि झारखंड आवासीय विद्यालय कस्तूरबा स्कूल में सुदूरवर्ती पठारी क्षेत्र की अत्यंत गरीब छात्राएं पढ़ती है. लेकिन, यहां की वार्डेन द्वारा मजदूरों की तरह काम कराया जा रहा है. बच्चों से काम कराने का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होते ही लोगों ने मामले की जांच कर कार्रवाई की मांग की है. लोगों ने कहा कि बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजा जाता है ना कि मजदूरी करने के लिए.

इस संंबंध में प्रमुख ओलिभाकांता कुजूर ने कहा कि झारखंड आवासीय विद्यालय में सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र की अत्यंत गरीब छात्राएं पढ़ती है. इनके माता-पिता बेहतर भविष्य के लिए इन्हें स्कूल पढ़ने भेजे हैं. लेकिन, स्कूल की वार्डेन द्वारा निजी स्वार्थ व पैसे बचाने के लालच में छात्राओं से मजदूरी कराया जाना बेहद गलत है.

चैनपुर के मीडिया कर्मियों ने दूरभाष पर वार्डेन लिली ग्रेस से संपर्क किया, तो उन्होंने तेवर भरे शब्दों में कहा कि बच्चों से काम नहीं करवायेंगे तो किससे करवायेंगे. स्कूल तक गाड़ी आने के लिए सड़क नहीं है. चावल भी लाना जरूरी है. इसलिए बच्चों से ही काम करवाना पड़ेगा. उन्होंने यह भी कहा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.
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By Samir Ranjan
Senior Journalist with more than 20 years of reporting and desk work experience in print, tv and digital media
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