गुमला कस्तूरबा स्कूल में बवाल: छात्रा की मौत पर भड़के परिजन, सीधे पोस्टमार्टम कराने पर हंगामा

स्कूल गेट के बाहर प्रदर्शन करते परिजन और आदिवासी संगठन के लोग
Kasturba Gandhi School Gumla: गुमला के भरनो कस्तूरबा गांधी विद्यालय में 10वीं की छात्रा प्रियंका कुमारी की संदिग्ध मौत पर परिजनों और आदिवासी संगठनों ने कड़ा प्रदर्शन किया है. साथ ही परिजनों ने इस मामले पर CBI जांच की मांग की है.
गुमला से दुर्जय पासवान की रिपोर्ट
Kasturba Gandhi School Gumla, गुमला : गुमला जिले के भरनो प्रखंड स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय में दसवीं की छात्रा प्रियंका कुमारी की संदिग्ध मौत का मामला अब पूरी तरह गरमा गया है. बुधवार को छात्रावास के कमरे में प्रियंका का शव फंदे से झूलता पाया गया. जिसके बाद गुरुवार को कस्तूरबा स्कूल के बाहर इंसाफ की मांग को लेकर जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ. सुबह 10 बजे से ही मृतका के परिजन, बूढ़ीपाट गांव के सैकड़ों ग्रामीण, समाजसेवी और रांची से पहुंचे आदिवासी संगठनों के नेता स्कूल के मुख्य गेट पर जुटने लगे. माहौल बिगड़ता देख स्कूल प्रबंधन ने अंदर से गेट बंद कर लिया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने गेट के बाहर ही धरना शुरू कर दिया और शिक्षा विभाग के खिलाफ जमकर आग उगली.
वार्डन से पूछा गया तीखा सवाल
प्रदर्शनकारी इस पूरे मामले की सीबीआई (CBI) या एसआईटी (SIT) से उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषी वार्डन को तुरंत बर्खास्त करने की मांग कर रहे थे. हंगामे के बीच जब स्कूल की मुख्य वार्डन दिव्या स्वर्णा टोप्पो और प्रभारी वार्डन नूतन शशि टेटे प्रदर्शनकारियों के सामने आईं, तो उनसे तीखे सवालों की बौछार कर दी गई. रांची से आए आदिवासी छात्र मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अजय टोप्पो ने वार्डन से पूछा कि घटना के दिन वे कहां थीं? इस पर वार्डन ने कहा कि वे छुट्टी पर थीं. प्रदर्शनकारियों ने तुरंत घेरा कि जब आपकी छुट्टी आधिकारिक रूप से मंजूर (ग्रांट) ही नहीं हुई थी, तो आप हॉस्टल छोड़कर कैसे चली गईं? इस पर परिसर में दोबारा हो-हंगामा शुरू हो गया.
परिजनों ने उठाए गंभीर सवाल
मृतक छात्रा प्रियंका की मां का रो-रोकर बुरा हाल था. उन्होंने रोते हुए कहा कि मेरी बच्ची के पेट में चार दिनों से दर्द था, तो स्कूल प्रबंधन ने हमें सूचना क्यों नहीं दी? उसे डॉक्टर के पास क्यों नहीं ले जाया गया? सिर्फ पेट दर्द होने पर मेरी मासूम बच्ची कभी फांसी नहीं लगा सकती.” परिजनों ने प्रशासन और स्कूल प्रबंधन पर मिली भगत का आरोप लगाते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए. प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना था कि घटना के बाद परिजनों को काफी देर से सूचना क्यों दी गई? परिजनों के पहुंचने से पहले ही पुलिस ने आनन-फानन में शव को फंदे से क्यों उतारा? बिना किसी डॉक्टर या अस्पताल ले जाए, मौके पर ही उसकी मौत की पुष्टि किसने की? शव को अस्पताल ले जाकर जान बचाने की कोशिश करने के बजाय सीधे पोस्टमार्टम के लिए क्यों भेज दिया गया?
रूममेट छात्राओं ने बताई आंखों देखी
आक्रोशित भीड़ बार-बार स्कूल परिसर के अंदर घुसने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भरनो थाना प्रभारी संतोष कुमार सिंह और सब-इंस्पेक्टर मंटू चौधरी ने पुलिस बल के साथ उन्हें गेट पर ही रोक लिया. बाद में प्रशासन की मध्यस्थता से सहमति बनी और प्रदर्शनकारियों का 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल (जिसमें मृतका के परिजन और आदिवासी नेता शामिल थे) जांच के लिए अंदर गया. प्रतिनिधिमंडल ने प्रियंका के कमरे में रहने वाली अन्य छात्राओं से अकेले में पूछताछ की. सभी छात्राओं ने एक सुर में बताया कि बुधवार सुबह वे सभी पीटी (PT) के लिए ग्राउंड में जमा हुई थीं. जब प्रियंका नहीं आई, तो शिक्षिका के कहने पर सहेलियां उसे बुलाने गईं. प्रियंका ने कहा कि उसके पेट में तेज दर्द है, वह नहीं आएगी. जब दोबारा कुछ छात्राएं उसे बुलाने गईं, तो कमरा अंदर से बंद था. काफी आवाज देने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो छात्राओं ने धक्का मारकर दरवाजा तोड़ा, जहां प्रियंका को पंखे के सहारे फंदे से झूलता पाया गया.
वार्डन पर केस दर्ज करने की तैयारी, मौके पर डटे अफसर
लंबी पूछताछ और छात्राओं के बयान के बाद भी पीड़ित परिवार और आदिवासी संगठन इसे आत्महत्या मानने को तैयार नहीं हैं. परिजनों ने वार्डन और प्रभारी वार्डन के खिलाफ हत्या की साजिश और घोर लापरवाही का मुकदमा दर्ज कराने की बात कही है. स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) कविता खलखो, अंचल अधिकारी (CO) अविनाश कुजूर और भारी पुलिस बल घंटों स्कूल परिसर में जमे रहे. इस प्रदर्शन में मुख्य रूप से जय आदिवासी परिषद की महिला अध्यक्ष निरंजना हेरेंज टोप्पो, आप नेता राजेश लिंडा, प्रवीण, हरिशंकर शाही सहित सैकड़ों ग्रामीण शामिल थे.
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By समीर उरांव
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