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दारी पहाड़ में लगेगा जतरा, इसका इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना

Updated at : 09 Nov 2025 5:04 PM (IST)
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दारी पहाड़ में लगेगा जतरा, इसका इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना

सिसई प्रखंड के दारी टोंगरी (पहाड़) में आज 10 नवंबर को जतरा लगेगा.

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प्रफुल भगत, सिसई सिसई प्रखंड के दारी टोंगरी (पहाड़) में आज 10 नवंबर को जतरा लगेगा. दारी जतरा के बाद इस क्षेत्र के एक दर्जन गांवों में कोई भी शुभ काम शुरू होता है. अगहन पंचमी को लगने वाला प्राचीन पचोरा सह बारह पड़हा दारी जतरा का इतिहास सैंकड़ों साल पुराना है. दुर्गम पहाड़ के ऊपर वर्षो पुराने बूढ़ा महादेव का शिवलिंग के साथ विभिन्न प्रकार के आदिवासी धार्मिक स्तंभ अपने प्राचीन होने की गवाही दे रहा है. जतरा में दिखने वाली काठ घोड़ा अब विलुप्त हो गयी है. पुरानी परंपरा के स्थान पर अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है. परंतु, दारी जतरा में कई प्राचीन परंपराओं को देखा जा सकता है. दुर्गम पहाड़ी के ऊपर स्थित शिवलिंग व धार्मिक स्तंभ की खोज किसने की और जतरा की परंपरा कब से शुरू हुई है. इसका ठोस जानकारी किसी के पास नहीं होने के बावजूद भी आदिवासी समाज के हजारों लोग बारह पड़हा के नेतृत्व में साल दर साल पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि व क्षेत्र की खुशहाली का कामना करते आ रहे हैं. सुकरू उरांव ने बताया कि अगहन पंचमी के दिन दारी टोंगरी स्थित ओहमा अड्डा (धार्मिक स्थल) पर विशेष पूजा अर्चना करने पर बूढ़ा महादेव नकटी धर्मे पुरखा पचबल कंडो का दर्शन प्राप्त होता है. जिससे सारे कष्ट मिट जाते हैं. जतरा को लेकर कई दंत कथा प्रचलित है. पूर्वजों के अनुसार दूर दूर से दर्जनों गांव के लोग दुर्गम रास्तों से काठ घोड़ा व कड़सा लेकर पूजा व नृत्य करने दारी टोंगरी स्थित ओहमा अड्डा आते थे. बोंडो गांव के लोग दुर्गम रास्तों से काठ घोड़ा लेकर आते थे. एक दिन वापसी के समय एक व्यक्ति ने बाघ पंजा पर पेशाब कर दिया. जिससे उन लोगों को बाघ की दहाड़ के साथ कई परेशानियों का सामना करना पड़ा था. तब से वे जतरा आना छोड़ दिये. कहते हैं कि जतरा में मेहमान बुलाने व चावल का लड्डू बनाने की परंपरा वर्षो से चली आ रही है. एक सप्ताह तक काम बंद रहता है. जब बोंडो गांव के लोग लड्डू बनाने के लिए उरद धोते थे. तब दारी टोंगरी स्थित उबका झरिया (झरना) में उरद का छिलका दिखायी देता था. पर जब से बोंडो के लोग जतरा आना छोड़ दिये. तब से झरना में छिलका दिखायी देना बंद हो गया. चेंगरी गांव से भी काठ घोड़ा पर बैठकर राजा आते थे और शिवनाथपुर के दिवान कड़सा लेकर ओहमा अड्डा आते थे. पर दोनों में कुछ विवाद के कारण दोनों जतरा आना बंद कर दिये. परंतु चेंगरी के लोग अब भी नेग दस्तूर निभाते आ रहे हैं. इस साल 10 नवंबर को दारी टोंगरी पर जतरा लगेगा.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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VIKASH NATH

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By VIKASH NATH

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