मौत का स्वागत जीवन के बसंत की तरह करनेवाले क्रांतिकारी बिसात के साहसी योद्धा महेंद्र सिंह ने सड़क से लेकर सदन तक, यही नहीं जनता की हिफाजत के लिए जीवन के अंतिम क्षण तक इस साहस को अक्षुण्ण रखा. मानवीय मूल्यों को जीवंत बनाने के लिए इंकलाब की राह चुनने वाले महेंद्र सिंह को मौत का इल्म सपने में भी नहीं सताता था.
समाज की बेहतरी के लिए बदलाव को समर्पित
जिंदगी का एक-एक लम्हा इंकलाब की रफ्तार को तेज करने में गुजार देने के जज्बे के साथ राजनीतिक जीवन में प्रवेश करने वाले महेंद्र सिंह का जन्म गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड स्थित सुदूरवर्ती गांव खंभरा में 22 फरवरी 1954 को हुआ था. गांव में ही स्कूली शिक्षा पाने वाले महेंद्र सिंह घुमक्कड़ प्रवृत्त के थे. उच्च शिक्षा से वंचित रहकर भी उन्होंने स्वाध्याय के जरिये ना सिर्फ राजनीति शास्त्र, बल्कि दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र में गहरी पकड़ बनायी. भाकपा माले के झंडे तले बगोदर और पूरे गिरिडीह जिले में राजनीतिक आंदोलन को संगठित कर उसका कुशल नेतृत्व भी किया.
गरीब-गुरबों को अधिकार के लिए किया गोलबंद
गरीब-गुरबों की लड़ाई में हमेशा आगे रहनेवाले महेंद्र सिंह ने जनवादी अधिकार के आंदोलनों की गोलबंदी को और भी व्यापक बनाया. 1990 में आइपीएफ और 1995 व 2000 में भाकपा माले से बगोदर के विधायक रहे महेंद्र ने जनांदोलन के नेतृत्व के कारण कई फर्जी मुकदमों में कारावास भी झेला था. विधायक रहने के दौरान आंकड़ों पर आधारित उनके लेख अखबारों की सुर्खियां बनती थीं. जनतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले महेंद्र सिंह को एक आदर्श कम्युनिस्ट नैतिकता का जीवन व्यवहार खास बनाता गया. विरोधी भी उनसे मिलकर उनके मुरीद हो जाते थे.
मार्क्सवाद के देसी भाष्यकार
मार्क्सवाद के सूत्रों को देसी उदाहरणों से लोगों तक पहुंचाने की अद्भुत कला उन्हें ज्ञात थी और एक जननायक की तरह वे गंभीर विषयों की सरल व्याख्या करने में भी माहिर थे. जल-जंगल-जमीन से वृहत्तर संबंध में महेंद्र सिंह मार्क्सवादी दर्शन को जोड़ते थे. वह जनसमुदाय को संबोधित करते हुए अक्सर कहा करते थे-‘मैं झूठा वादा नहीं करता. मैं आपको धोखा नहीं दे सकता. मैं आपके सुख-दुख का साथी हूं, मैं आपकी लड़ाई का साझेदार हूं. मैं इससे पीछे नहीं भाग सकता.’ यही कारण है कि बगोदर या गिरिडीह जिला ही नहीं, एकीकृत बिहार और बाद में झारखंड के शोषित-पीड़ित अवाम हर मौके पर उन्हें ही याद करता था. अवाम को भरोसा था कि महेंद्र सिंह अधिकार की एक ऐसी आवाज हैं, जिन्हें कतई दबाया नहीं जा सकता. 16 जनवरी 2005 को अपने विधानसभा क्षेत्र के सरिया थानांतर्गत दुर्गी धवैया गांव में ग्रामसभा को संबोधित करने के बाद ग्रामीणों से बात करने के दौरान महेंद्र सिंह को कुछ बंदूकधारियों ने मौत की नींद सुला दी.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

