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गढ़वा में छठ घाट पर रात गुजारने की परंपरा अब भी कायम, आस्था से गुलजार रहते हैं घाट

Updated at : 25 Oct 2025 8:28 PM (IST)
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गढ़वा में छठ घाट पर रात गुजारने की परंपरा अब भी कायम, आस्था से गुलजार रहते हैं घाट

गढ़वा में छठ घाट पर रात गुजारने की परंपरा अब भी कायम, आस्था से गुलजार रहते हैं घाट

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जितेंद्र सिंह, गढ़वा आस्था, श्रद्धा और सूर्योपासना का महापर्व छठ पूजा पूरे देश में अलग उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन अब कई जगहों पर छठ घाटों पर रातभर रुकने की परंपरा दम तोड़ रही है. वहीं गढ़वा जिले में यह परंपरा आज भी कायम है. यहां पूरी रात छठ घाट गुलजार रहते हैं और छठ व्रती पूरी रात घाट पर ही रखते हैं. यहां घाटों की सजावट, श्रद्धालुओं का उत्साह, रात भर गीतों की ध्वनि और परंपराओं से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है. गढ़वा जिले की पहचान न केवल स्थानीय स्तर पर है, बल्कि झारखंड के प्रमुख छठ स्थलों में है. यहीं वजह है कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में छठ व्रती और श्रद्धालु गढ़वा पहुंचते हैं. दुल्हन की तरह सजाये जाते हैं छठ घाट छठ के अवसर पर गढ़वा शहर के प्रमुख घाटों को दुल्हन की तरह सजाया जाता है. खासकर स्टूडेंट क्लब छठ घाट को विशेष रूप से सजाया जाता है, जहां 41 वर्षों से लगातार भव्य आयोजन किया जा रहा है. इसके समीप स्थित फ्रेंड्स क्लब, टी ग्रुप और छठ सेवा समिति सहीजना के घाटों पर भी प्रकाश व्यवस्था, रंगीन झालर, मंच, सुरक्षा बैरिकेडिंग और सांस्कृतिक माहौल लोगों को आकर्षित करता है. जिले के सभी घाटों में रात गुजारने की परंपरा गढ़वा जिले के लागभग सभी घाटों पर रात गुजारने की परंपरा अब भी पूरी श्रद्धा से निभायी जाती है. रातभर छठ के पारंपरिक गीत, ढोल-नगाड़ों की गूंज व जागरण से जिले के घाट गुलजार रहते हैं. इस दौरान महिलाएं छठ गीत गाती हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य प्रसाद और पूजन सामग्री की देखरेख करते हैं. जिले के शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में धूमधाम से छठ पूजा की जाती है. कोयल नदी, सोन नदी, नारायण वन (केतार), बांकि नदी, दानरो नदी, तहले नदी, सतबहिनी झरना, सूर्य मंदिर परिसर समेत जिले के अन्य घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. संयम, पवित्रता और प्रकृति के आदर का पर्व है छठ गढ़वा के छठ व्रती न केवल धार्मिक परंपरा निभाते हैं, बल्कि घाटों की स्वच्छता, पवित्र वातावरण और जल संरक्षण का संदेश भी देते हैं. श्रद्धालु नहाये-खाये से लेकर खरना तक और फिर अर्घ्य तक अत्यंत संयम व अनुशासन का पालन करते हैं. शहर और गांवों के घाटों पर रात में खाने-पीने के स्टॉल, खिलौने, झूले, सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Akarsh Aniket

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By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

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