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आठ गांवों से मिलकर बना था गढ़वा शहर, 68 साल बाद भी शहरी सीमा वही

Updated at : 11 Feb 2026 9:28 PM (IST)
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आठ गांवों से मिलकर बना था गढ़वा शहर, 68 साल बाद भी शहरी सीमा वही

1957 में अधिसूचित क्षेत्र बना गढ़वा, विस्तार के बावजूद आज भी उन्हीं आठ गांवों की आबादी पर हो रहा है चुनाव

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1957 में अधिसूचित क्षेत्र बना गढ़वा, विस्तार के बावजूद आज भी उन्हीं आठ गांवों की आबादी पर हो रहा है चुनाव पीयूष तिवारी समय के साथ गढ़वा शहर का दायरा काफी बढ़ चुका है. शहर का विस्तार अब कल्याणपुर, छतपरपुर, झलुआ, नवादा, जोबरईया, सुखबाना, हूर, झुरा और चेतना जैसे गांवों तक हो गया है. इसके बावजूद गढ़वा शहरी क्षेत्र की आधिकारिक सीमा आज भी वर्ष 1957 में निर्धारित सीमा तक ही सीमित है. उस समय गढ़वा के आठ राजस्व गांवों गढ़वा, सहिजना, दीपवां, नगवां, उंचरी, टंडवा, पीपरा कला और सोनपुरवा को मिलाकर अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया था. बाद में वर्ष 1972 में इसे नगरपालिका का दर्जा मिला और 2016 में यह नगर परिषद बना. हालांकि इन सभी परिवर्तनों के बावजूद नगर निकाय की सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ. आज भी इन्हीं आठ गांवों की जनसंख्या के आधार पर नगर परिषद का चुनाव कराया जा रहा है. शहर के बाहरी हिस्सों को नगर निकाय में शामिल करने और उन्हें शहरी क्षेत्र घोषित करने की मांग समय-समय पर उठती रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है. नगर निकाय को 50 साल तक ब्रजमोहन दी सेवा गढ़वा शहर के सहिजना मोहल्ला निवासी 80 वर्षीय ब्रजमोहन प्रसाद ने करीब 50 वर्षों तक नगर निकाय में अपनी सेवा दी. उन्होंने वर्ष 1968 में, जब गढ़वा अधिसूचित क्षेत्र था, प्रधान सहायक के रूप में योगदान दिया. इसके बाद नगरपालिका, नगर पंचायत और नगर परिषद बनने तक, यानी वर्ष 2017 तक उन्होंने विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया. वर्ष 2007 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने दैनिक वेतनमान पर विभाग की सेवा जारी रखी. ब्रजमोहन प्रसाद बताते हैं कि शुरुआती दौर में विभाग के पास पर्याप्त फंड नहीं होता था. विकास कार्यों के लिए मुख्य रूप से टैक्स से प्राप्त राशि पर ही निर्भर रहना पड़ता था. उस समय अधिसूचित क्षेत्र और नगरपालिका में कुल 42-43 कर्मचारी कार्यरत थे, लेकिन वेतन के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. वेतन भुगतान के लिए 40 प्रतिशत राशि सरकारी ऋण से, 30 प्रतिशत अनुदान (ग्रांट) से और 30 प्रतिशत अधिसूचित कोष से जुटायी जाती थी. खादी बाजार, चौधराना बाजार, बकरी बाजार, बैल बाजार सहित अन्य दुकानों और घरों से वसूले गये टैक्स से विभाग का काम चलता था. आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. नगर परिषद केपास करोड़ों रुपये का फंड है और कर्मचारियों की संख्या भी कई गुना बढ़ चुकी है. स्ट्रीट लाइट नहीं, चौराहों पर जलते थे लालटेन ब्रजमोहन प्रसाद ने बताया कि पहले गढ़वा शहर में स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था नहीं थी. शहर के लगभग 25-30 स्थानों पर केरोसिन से चलने वाले लालटेन टांगे जाते थे. यही उस समय की बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी. लालटेन जलाने के लिए विभाग में दो लाइटमैन नियुक्त थे, जो प्रतिदिन शाम को इन्हें जलाते थे. पेयजल की स्थिति भी बेहतर नहीं थी. शहर में एक भी चापाकल नहीं था. विभाग की ओर से एक कूप शोधक नियुक्त था, जिसकी जिम्मेदारी सभी सार्वजनिक कुओं की सफाई करना और उनमें ब्लीचिंग पाउडर डालकर पानी को पीने योग्य बनाये रखना था उन्होंने कहा कि 68 साल पहले आठ गांवों से शुरू हुआ गढ़वा शहर आज भले ही भौगोलिक रूप से फैल चुका हो, लेकिन प्रशासनिक रूप से अब भी अपनी पुरानी सीमाओं में सिमटा हुआ है.

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Akarsh Aniket

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By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

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