गढ़वा शहर को 1955 में मिला पहला सिनेमा हॉल, 1971 में बनी पहली जलमीनार

गढ़वा शहर को 1955 में मिला पहला सिनेमा हॉल, 1971 में बनी पहली जलमीनार
पीयूष तिवारी, गढ़वा गढ़वा शहर में आज भले ही एक भी सिनेमा हॉल नहीं है, लेकिन एक समय ऐसा था जब यहां दो-दो सिनेमा हॉल और चार-पांच वीडियो हॉल हुआ करते थे. देश की पहली बोलती फिल्म वर्ष 1931 में बनी थी. इसके करीब 22 वर्ष बाद, वर्ष 1953 में गढ़वा शहर में भी फिल्म प्रदर्शन की शुरुआत हुई. उस समय स्थायी सिनेमा हॉल नहीं था. शामियाना से घेरकर परदे पर फिल्म दिखाने की व्यवस्था की जाती थी. इसके बाद 1 अप्रैल 1955 को गढ़वा को पहला सिनेमा हॉल मिला, जिसका नाम अशोक टॉकिज था. इसकी शुरुआत महादेव राम केसरी और बलि राम केसरी ने मिलकर की थी. बाद में उनके वंशजों सहित अन्य लोग भी इसमें भागीदार बने और संचालन किया. अशोक टॉकिज आज भी जर्जर स्थिति में खड़ा है, लेकिन करीब 20 वर्षों से बंद पड़ा है. उस समय गढ़वा में बिजली की सुविधा नहीं थी, इसलिए सिनेमा हॉल का संचालन जनरेटर से किया जाता था. अशोक टॉकिज की स्थापना से जुड़ा एक प्रसंग भी प्रचलित है. बताया जाता है कि नगरउंटारी राज परिवार भी गढ़वा में सिनेमा हॉल खोलना चाहता था. इसी कारण लाइसेंस को लेकर विवाद की स्थिति बनी. अंततः लाइसेंस अशोक टॉकिज को ही मिला. इसके बाद वर्ष 1992 में ज्योतिश्री सिनेमा हॉल का संचालन शुरू हुआ, लेकिन वर्तमान में यह भी बंद पड़ा है. वहीं शहर को पहली जलमीनार 1971 में मिली थी. मंत्री गोपीनाथ सिंह ने 2.25 लाख रुपये में बनवायी थी जलमीनार गढ़वा जब अधिसूचित क्षेत्र हुआ करता था, तभी शहर में घर-घर पानी पहुंचाने की योजना पर विचार शुरू हुआ था. लेकिन उस समय विभाग के पास पर्याप्त राशि नहीं थी. वर्ष 1969 के उपचुनाव में गढ़वा विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के प्रत्याशी गोपीनाथ सिंह विधायक चुने गये और बिहार सरकार में खनन एवं भू-तत्व मंत्री बने. उनके कार्यकाल में अधिसूचित क्षेत्र समिति के सदस्यों और अन्य गणमान्य लोगों की मांग पर वर्ष 1970-71 के बीच पेयजल एवं स्वच्छता विभाग परिसर में पानी टंकी का निर्माण कराया गया. साथ ही दानरो नदी किनारे सेटलिंग टैंक भी बनाया गया. बताया जाता है कि मात्र 2.25 लाख रुपये की लागत से न केवल जलमीनार और सेटलिंग टैंक का निर्माण हुआ, बल्कि इसी राशि से शहर में पाइपलाइन बिछायी गयी और कई स्थानों पर नल कनेक्शन भी दिये गये. वर्तमान में यह जलमीनार अनुपयोगी हो चुका है. इसे खतरनाक और ध्वस्त करने योग्य घोषित किया जा चुका है. हालांकि धन की कमी के कारण इसे अब तक हटाया नहीं गया है. इस जलमीनार के निर्माण के करीब साढ़े तीन दशक बाद वर्ष 2009 में कोयल नदी से 11 किलोमीटर दूर गढ़वा शहर तक पानी लाने की नयी योजना शुरू की गयी. यह योजना पूरी तरह से पूर्ण नहीं हो सकी है, फिर भी शहर की बड़ी आबादी तक इसका पानी पहुंच रहा है.
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