कभी नहीं गया स्कूल, सुन कर हासिल िकया किताबी ज्ञान

रमकंडा : यदि हौसला बुलंद हो, तो दिव्यांगता भी किसी के लिए बोझ नहीं बन सकती. इसी बात को चरितार्थ किया है. गढ़वा जिले के सुदूरवर्ती रमकंडा प्रखंड के चपरी गांव का देवनारायण सिंह. उम्र 30 वर्ष और दोनों आंखों से अंधा. इसके बावजूद आज देवनारायण सिंह अपने काबिलियत के दम पर अपने परिवार का […]
रमकंडा : यदि हौसला बुलंद हो, तो दिव्यांगता भी किसी के लिए बोझ नहीं बन सकती. इसी बात को चरितार्थ किया है. गढ़वा जिले के सुदूरवर्ती रमकंडा प्रखंड के चपरी गांव का देवनारायण सिंह. उम्र 30 वर्ष और दोनों आंखों से अंधा. इसके बावजूद आज देवनारायण सिंह अपने काबिलियत के दम पर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा है. साथ ही सुखी दांपत्य जीवन का निर्वहन कर रहा है.
सुर होने के बावजूद देवनारायण किसी का बोझ नहीं बना, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए घर में ही छोटा सा किराना दुकान रखकर चलाता है. साथ ही साइकिल का पंक्चर भी बनाता है. उसके किराना दुकान में ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में उपयोग होने वाले कुछ समान मिल जायेंगे. दोनों आंखों से अंधा होने के बावजूद उसने अपने दिमाग को इस तरह विकसित किया है कि दुकान में रखे हर एक समान की उसे बखूबी जानकारी है, जिसकी वजह से वह ग्राहकों को सामान देता है
और उनसे पैसे लेकर उसे गिनकर रखने का भी काम करता है. अपने हाथों से छूकर वह नोटों की पहचान कर लेता है. इसके साथ ही अपने बौद्धिक क्षमता की मदद से तराजू पर किसी भी चीज की सही माप-तौल कर लेता है. दिलचस्प बात यह है कि वह साइकिल के टायर का पंक्चर भी आसानी से बना लेता है. ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपनी जरूरतों के हिसाब से उसके दुकान पर पहुंचते हैं. इसके साथ ही वह शादी-ब्याह के सीजन में लाउड स्पीकर की बुकिंग भी करता है. बुकिंग मिलने के बाद वह खुद अपने भी बजाता है. इतना ही नहीं, खराब होने पर उसकी मरम्मत कर भी खुद ही कर लेता है. देवनारायण हारमोनियम भी बजाता है. इससे उसको अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए पैसे के लिए किसी पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है. फिलहाल इन दिनों अपने परिचितों से बात करने के लिए मोबाइल भी रखा है. लेकिन मोबाइल में अंकित नंबरों का सही ज्ञान नहीं होने से फोन लगाने में परेशानी होती है. उसने बताया कि दो वर्ष की उम्र में चेचक बीमारी की वजह से उसके दोनों आंखों ने काम करना बंद कर दिया. गरीबी के कारण वह अपने आंखों का इलाज नहीं करा सका. इसकी वजह से वह कुछ भी नहीं देख सकता और स्कूल भी नहीं जा सका. लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी. अपने अंदर छुपी काबिलियत को निखारना शुरू किया. धीरे-धीरे उसने अपने बौद्धिक क्षमता की मदद से सुनकर बहुत सारी जानकारियां हासिल की. बिना पढ़े ही जोड़-घटाव का ज्ञान हो गया. करीब तीन वर्ष पहले एक मानसिक रूप से विक्षिप्त लड़की से शादी भी हो गयी.
तब उसने घर में ही दुकान खोलने की सोची. ताकि घर का खर्चा चलाया जा सके. किसी दूसरे या अपनी पत्नी की सहायता से वह बाजार जाने लगा और अपनी कमाई के पैसे से सामानों की खरीदारी कर दुकान खोल दी. आज उसकी एक छोटी सी बेटी भी है. सरकार की तरह से पेंशन के रूप से देवनारायण सिंह को 600 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलता है. गांव में सूरदास के नाम से चर्चित देवनारायण सिंह अपने गांव के लोगों को उसकी आवाज से पहचान लेता है. उसे बखूबी जानकारी है की उक्त आवाज किसकी है. इसके साथ ही बाहरी लोगों के होने की भी वह आवाज से पहचान कर लेता है. उसने बताया कि फिलहाल उसके परिवार की जिंदगी किसी तरह कट रही है.
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