गुड़ाबांदा में कोई दस्ता नहीं, पर रीजनल कमेटी में 15 सदस्य अभी भी

Updated at : 18 Feb 2017 6:17 AM (IST)
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गुड़ाबांदा में कोई दस्ता नहीं, पर रीजनल कमेटी में 15 सदस्य अभी भी

कान्हू ओड़िसा के शिमली पॉल फॉरेस्ट पर करना चाहता था कब्जा गुड़ाबांदा में लेवी में हर वर्ष मिलते थे एक करोड़ रुपये गुड़ाबांदा : 25 लाख के इनामी नक्सली कान्हू राम मुंडा और उसके छह साथियों का सरेंडर के बाद पुलिस दावा कर रही है कि गुड़ाबांदा से नक्सलवाद का सफाया हो गया. अब अहम […]

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कान्हू ओड़िसा के शिमली पॉल फॉरेस्ट पर करना चाहता था कब्जा

गुड़ाबांदा में लेवी में हर वर्ष मिलते थे एक करोड़ रुपये
गुड़ाबांदा : 25 लाख के इनामी नक्सली कान्हू राम मुंडा और उसके छह साथियों का सरेंडर के बाद पुलिस दावा कर रही है कि गुड़ाबांदा से नक्सलवाद का सफाया हो गया. अब अहम सवाल है कि नक्सलियों ने लेवी के रूप में वसूले रुपये कहां छिपा रखे हैं. क्या उक्त खजाना का पता पुलिस लगा पायेगी.
माओवादी नेता किशन जी की मौत के बाद से नक्सली संगठन लगातार कमजोर होता गया. पश्चिम बंगाल के नक्सलियों का कनेक्शन गुड़ाबांदा से कट सा गया. ऐसे में कान्हू राम मुंडा क्षेत्र में नक्सली संगठन का कर्ताधर्ता बन गया. उसी की देखरेख में लेवी की राशि वसूली जाती थी. वसूली गयी राशि उसके पास पहुंचायी जाती थी. तीन जनवरी को नक्सली सिपाई टुडू के पुलिस ने मार गिराया और उसकी पत्नी सोनाली को गिरफ्तार कर लिया. सोनाली ने अपने बयान में बताया था कि सिपाई के बैग से बरामद (लगभग 29 हजार, जिसमें नये नोट थे) रुपये कान्हू मुंडा ने दिये थं. सिपाई के पास से बरामद डायरी में लेवी देने वाले कई संवेदकों के नाम लिखे थे.
बरामद डायरी ऐसे में माना जा रहा है कि लेवी की रकम कान्हू मुंडा के पास पहुंचायी जाती थी. इसलिए इसकी जानकारी कान्हू राम मुंडा को होगी. उसने उक्त रुपये कहां रखे हैं.
नोटबंदी के बाद चर्चा हुई कि नक्सलियों के लाखों के पुराने नोट कई बड़े संवेदकों और अपने कुछ खास लोगों के मार्फत बैंक या डाकघर में जमा करवाया. बताते हैं कि कई बड़े संवेदकों को नक्सलियों ने पुराने देनोट कर नये नोट प्राप्त किये थे. इस संदेह में पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की थी.
पन्ना का अवैध खनन था मुख्य स्रोत
सूत्रों के मुताबिक थाना क्षेत्र में नक्सलियों को लेवी के रूप में हर साल एक करोड़ से अधिक की राशि मिलती थी. पिछले सात-आठ वर्षों से नक्सलियों से लेवी लेने का मुख्य स्रोत ठुरकुगोड़ा और बारूमुठी से सटे पहाड़ों पर हो रहे पन्ना का अवैध खनन और अवैध व्यापार था. कहा जाता है कि पन्ना के अवैध खनन और व्यापार पर नक्सलियों का आधिपत्य था. लेवी का दूसरे सबसे बड़े स्रोत सुवर्णरेखा परियोजना और अन्य सरकारी योजनाओं के संवेदक थे.
खुफिया विभाग ने कई बार सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि इन संवेदकों से नक्सली पांच प्रतिशत की राशि लेवी के रूप में वसूलते हैं. इनके अलावे नक्सलियों को पत्थर का अवैध खनन, केंदू पत्ता संग्रह, साल पत्ता संग्रह कर्ताओं से भी लेवी के रूप में खासी रकम मिलती थी.
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