डीसी की पहल, शिक्षक की मेहनत से साक्षर बना गांव

Published at :15 May 2016 6:07 AM (IST)
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डीसी की पहल, शिक्षक की मेहनत से साक्षर बना गांव

दिलीप पोद्दार पटमदा प्रखंड मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर नक्सल प्रभावित गांव है, जोड़सा. झारखंड अौर पश्चिम बंगाल की सीमा के बीच स्थित इस गांव में 1985 से पहले कोई बड़ा प्रशासनिक पदाधिकारी नहीं पहुंचा था. तत्कालीन डीसी केसी मिश्रा, डीडीसी एसके नेगी, एसडीओ पीके त्रिपाठी गांव में प्राथमिक विद्यालय का उदघाटन करने पहुंचे, तो […]

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दिलीप पोद्दार

पटमदा प्रखंड मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर नक्सल प्रभावित गांव है, जोड़सा. झारखंड अौर पश्चिम बंगाल की सीमा के बीच स्थित इस गांव में 1985 से पहले कोई बड़ा प्रशासनिक पदाधिकारी नहीं पहुंचा था. तत्कालीन डीसी केसी मिश्रा, डीडीसी एसके नेगी, एसडीओ पीके त्रिपाठी गांव में प्राथमिक विद्यालय का उदघाटन करने पहुंचे, तो गांव की स्थिति देख अवाक रह गये.

पता चला कि गांव में 30 सबर परिवार हैं. गांव के 95 फीसदी लोग अशिक्षित हैं. डीसी को बताया गया कि इस गांव में एक शख्स हैं, जो शिक्षक हैं. वह दूर के किसी स्कूल में पदस्थापित हैं. उपायुक्त ने तत्काल आदेश दिया कि उक्त शिक्षक (सुखदेव कुंभकार) को पटमदा स्कूल से हटा कर गांव के जोड़सा प्राथमिक विद्यालय में तैनात किया जाये. शिक्षक को बुलाया और उनसे कहा कि उन्हें गांव के लोगों को साक्षर बनाना है.

उपायुक्त की बातों से सुखदेव बेहद प्रभावित हुए. उनमें गजब की ऊर्जा का संचार हुआ. उन्होंने मदन प्रसाद माझी और पटमदा इंटर कॉलेज के प्राचार्य पंचानंद दास के साथ मिल कर एक टीम बनायी. टीम ने गांव के लोगों को शिक्षा का महत्व बताना शुरू किया. शुरुआती दिनों में युवाअों को अक्षर ज्ञान देने के लिए गांव में फ्री कोचिंग क्लास शुरू की.

पहली कक्षा से लेकर इंटर तक के विद्यार्थियों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू किया.

असर यह हुआ कि जो बच्चे या युवा पढ़ रहे थे, ग्रामीणों के बीच लोकप्रिय होने लगे, क्योंकि गांव यदि किसी की चिट्ठी आती, तो लोग इन्हीं से पढ़वाते थे. इस तरह लोगों के बीच शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी. धीरे-धीरे नि:शुल्क ज्ञान पाने के लिए तीन शिफ्ट में क्लास लगने लगी. आज हालत यह है कि गांव के 100 में 77 परिवार के लोग शिक्षित हैं.

इसके साथ ही इसी गांव के लोग अपने गांव से 15 किमी की परिधि में शिक्षा के लिए रोल मॉडल बन गये हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पढ़ाई-लिखाई के बाद इस गांव के कई लोग बहुत अच्छी जगह नौकरी कर रहे हैं. इस गांव के लोगों से सीख लेकर आसपास के गांवों में भी शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है. अच्छी बात यह है कि अभियान शुरू करनेवाले तीन शिक्षक रिटायरमेंट के बाद आज भी मुफ्त शिक्षा दे रहे हैं.

यह सटीक उदाहरण है प्रशासन की दूरदर्शिता का. यदि प्रशासन ईमानदार पहल करे, तो बुरे से बुरे हालात भी बदल सकते हैं, जैसा पूर्वी सिंहभूम के पटमदा प्रखंड मुख्यालय से 15 िकमी दूर नक्सल प्रभावित गांव जोड़सा में हुआ. 30 साल में यह निरक्षर गांव साक्षर (77%) बन गया. सब हुआ एक उपायुक्त की सिर्फ डीसी की एक सोच और एक शिक्षक की मेहनत से.

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