बैधनाथ ने ओड़िया साहित्य को दी नयी दिशा

Updated at : 04 Jan 2018 6:01 AM (IST)
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बैधनाथ ने ओड़िया साहित्य को दी नयी दिशा

बहरागोड़ा : बहरागोड़ा की साकरा पंचायत के शासन गांव निवासी दिवंगत ओड़िया साहित्यकार पंडित बैद्यनाथ मिश्रा ओड़िया साहित्याकाश के ऐसे अमर पुष्प हैं, जिनकी सुंगध हमेशा अमंद रहेगी. वे अपने साहित्य सुमन सौरभ से सभी को सुभोशित करते रहेंगे. किसी उपवन में प्रथम पुष्प व हार में प्रथम मणी का जो स्थान होता है. वही […]

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बहरागोड़ा : बहरागोड़ा की साकरा पंचायत के शासन गांव निवासी दिवंगत ओड़िया साहित्यकार पंडित बैद्यनाथ मिश्रा ओड़िया साहित्याकाश के ऐसे अमर पुष्प हैं, जिनकी सुंगध हमेशा अमंद रहेगी. वे अपने साहित्य सुमन सौरभ से सभी को सुभोशित करते रहेंगे. किसी उपवन में प्रथम पुष्प व हार में प्रथम मणी का जो स्थान होता है. वही स्थान ओड़िया साहित्य में पंडित बैद्यनाथ मिश्रा का है. उन्होंने अपनी लेखनी से ओड़िया साहित्य को एक नयी दिशा और दशा दी. उनकी लेखनी में आजादी के लिए जोश भी था तो सामाजिक कुरीतियों जैसे सती प्रथा, बलि प्रथा पर कुठाराघात करता है. अपनी लेखनी से उन्होंने प्रेम को एक अलग रूप में परिभाषित किया.

चार जनवरी 1918 में बैधनाथ मिश्रा का जन्म बहरागोड़ा के शासन गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम कार्तिक चंद्र मिश्रा और माता का नाम सरस्वती देवी था. वे अपने माता-पिता की एक मात्र संतान थे. उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा चक्रधरपुर में प्राप्त की. बहरागोड़ा में शिक्षा प्राप्त की. बहरागोड़ा हाई कूल से मैट्रिक पास की. रांची कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की. रांची से वे अपने गांव लौटे और यहां के प्राथमिक विद्यालय में अवैतनिक शिक्षक के रूप में छह साल तक काम किया.
इसके बाद वे गुड़ाबांदा के बंदगांव प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक बने. 12 साल तक इस स्कूल में प्रधानाध्यापक रहे. फिर ओड़िशा के मयूरभंज जिला के पांड्रा प्राथमिक विद्यालय में 18 साल तक प्रधानाध्यापक रहे. इसी स्कूल से वे सेवानिवृत्त हुए. 1934 में शासन में आयोजित सिंहभूम वृहत कवि सम्मेलन का आयोजन शासन गांव में किया. कवि सम्मेलन में प्रथम स्थान प्राप्त के लिए बैधनाथ मिश्रा को इंद्रमती पदक से सम्मानित किया गया. 1934 में बहरागोड़ा अंग्रेजी उच्च विद्यालय में छात्रों को संगठित कर विवेकानंद छात्र संगठन की स्थापना की. उच्च शिक्षा के लिए वे रांची विश्व विद्यालय गये. अध्ययन काल में ही 1938 में डॉ मायाधर मानसिंह की धूप नाक कविता प्रतिवाद के रूप में मानसी नाम प्रेम काव्य की रचना की. 1944 में तत्व दृष्ठा भीमबोई नामक पुस्तक की रचना की. ओडि़या भाषा में उन्होंने अनेक पुस्तकोंं की रचना की. भारतीय दर्शन तथा पश्चात दर्शन का अध्ययन किया. 1938 में बहरागोड़ा प्रखंड में सुस्वास्थ्य के अधिकारी चयन प्रतियोगिता में बैधनाथ मिक्षा प्रथम स्थान प्राप्त कर लौह मानव के उपाधि से सम्मानित हुए थे. बैद्यनाथ मिश्रा एक धार्मिक, निर्भिक स्पष्टवादी व्यक्तित्व के धनी थे. सिंहभूम जिला में जमशेदपुर, खंडामौदा, शासन, मौदा आदि स्थानों में केंद्रीय मंत्री,ओड़िशा के मंत्रियों, राज्य के मंत्रियों द्वारा सम्मानित किये गये. 13 जनवरी 2001 को उनका निधन हो गया. बैद्यनाथ मिश्रा की रचनाएं : बैद्यनाथ मिश्रा रचित मानसी (प्रेम काव्य), तत द्रष्टा भीमबोई, सनातनी शक्ति पूजा, बलि प्रथा, वेंदात, यज्ञ तांत्रिक समीक्षा, पंचमी (कविता), माया, परलोक रहस्य, सनातन हूंदू धर्म, सती प्रथा समेत अन्य कई रचनाएं काफी चर्चित रही.
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