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Lead News : सहयोग की नयी कल्पना आदिवासी महिलाओं के पास

Updated at : 27 Mar 2025 8:35 PM (IST)
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Lead News : सहयोग की नयी कल्पना आदिवासी महिलाओं के पास

सेमिनार में देश भर से करीब 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. गुरुवार को दूसरे दिन के पहले सत्र में लगभग 45 शोधार्थियों ने महिला के विभिन्न आयामों पर अपने शोध आलेख प्रस्तुत किया.

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आह्वान. लैंगिक संवेदनशीलता पर एसकेएमयू में राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न, बोले प्रोफेसर प्रो ज्यां द्रेज

प्रतिनिधि, दुमका नगर

सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का गुरुवार को संपन्न हो गया. झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी विभाग द्वारा प्रायोजित था. सेमिनार में देश भर से करीब 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. गुरुवार को दूसरे दिन के पहले सत्र में लगभग 45 शोधार्थियों ने महिला के विभिन्न आयामों पर अपने शोध आलेख प्रस्तुत किया. जाने-माने अर्थशास्त्री दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और रांची विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर प्रो ज्यां द्रेज ने इस तरह के आयोजन की प्रशंसा करते हुए बताया कि विश्वविद्यालय के आयाम के लिए बहुत ही जरूरी आयोजन है, जो कि सार्थक संवाद, संबंध और चिंतन को हमारे सामने रखते हैं. यह चिंतन के नये धरातल प्रस्तुत करते हैं. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय कोई कोचिंग संस्था नहीं है, जो परीक्षा पास करने पर केंद्रित है. यहां हमें सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों के व्यापक संदर्भों से परिचय प्राप्त होते हैं. इसीलिए जीवन जीने की कला यहां हमें प्राप्त होती है. मानवीय संवेदनशीलता का विकास होता है. उन्होंने विषय के संदर्भ में आदिवासी समाज में को-ऑपरेशन और कंपटीशन के विशेष आयाम की चर्चा की. सहयोग की बिल्कुल ही नयी कल्पना आदिवासियों के पास है, जिसे सभी समाज बहुत कुछ जान और सीख सकते हैं. अन्य समाजों की तुलना में झारखंडी महिला आदिवासी समाज को निश्चित तौर पर जो स्वतंत्रता प्राप्त है. वह उनकी अपनी परंपरा की देन है, जो कि प्राकृतिक के साथ सहचर्य से प्राप्त हुई है. कुलपति प्रो बिमल प्रसाद सिंह ने झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महिला संवेदनशीलता पर इस तरह के कार्यक्रम अब निरंतर आयोजित होते रहेंगे. उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से ही हम समाज की कुरीतियों को समाप्त कर सकते हैं. कुलपति ने कहा कि सेमिनार अत्यंत सार्थक रहा है. विश्वविद्यालय का प्रयास रहेगा कि सेमिनार के परिणामों को नीति निर्माताओं तक पहुंचायी जाये. निर्मला पुतुल ने अपनी बातों को रखते हुए संवैधानिक मूल्यों की चर्चा की. आदिवासी समाज के संदर्भ में कहां उनका हनन हो रहा है, इस पर विचार व्यक्त करते हुए अपने अनुभव को साझा किया. कहा कि आज भी कुछ क्षेत्रों में हाथियों के डर से आदिमासी महिलाओं को पेड़ पर बच्चे जनने पड़ते हैं. उनके लिए कोई स्वास्थ्य चिकित्सा व्यवस्था अभी भी उपलब्ध नहीं है. यह आधुनिक समाज के लिए एक बहुत ही चिंतनीय पहलू है. सेमिनार की सचिव और इतिहास विभाग की सहायक प्राद्यपिक अमिता कुमारी ने पिछले दो दिनों में सेमिनार में हुए गतिविधियों से सभी को परिचित कराया. समापन पर स्नातकोत्तर वाणिज्य विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ बिनोद मुर्मू ने धन्यवाद ज्ञापन किया. इसके बाद राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजेता छात्र-छात्राओं को पुरस्कार प्रदान किए गए. मंच संचालन राजनीति विज्ञान की शोध छात्रा स्निग्धा हांसदा और वैशाली बरियार ने किया.

स्त्री व पुरुष को समाज के दो ध्रुव में नहीं बांटें : इशिता मुखोपाध्याय

विभिन्न सत्रों में प्रोफेसर इशिता मुखोपाध्याय बताया कि स्त्री और पुरुष जैसे समाज दो ध्रुव में बंटा नहीं देखना चाहिए. इस तरह विषय को देखने समझने से हम समस्या को सही परिपेक्ष्य में नहीं समझ सकते हैं. आप पुरुष होते हुए भी स्त्री ध्रुव के प्रतिनिधि हो सकते हैं. स्त्री होते हुए भी हम पुरुष मानसिकता से संचालित हो सकते हैं. यह सिर्फ शारीरिक तौर पर नहीं, बल्कि मानसिक स्थितियों के आधार पर समस्या को समझने की कोशिश है. डॉ मीनाक्षी मुंडा ने अपनी बात रखते हुए आदिवासी समाज और संस्कृति के सार्थक अर्थों पर प्रकाश डाला कि हम सही संदर्भ में इसे समझ नहीं पाते हैं. गहराई से इसके अर्थ और आयाम को नहीं समझ पाना ही कई समस्याओं का कारण है. आदिवासी समाज में जो पूजा पद्धति है, जो व्यवस्थाएं हैं, उनका भी एक सार्थक अर्थ और महत्व है, जिसे हमें सही संदर्भ में समझना होगा. झारखंड के आदिवासी महिलाओं के स्थिति और संदर्भों पर संवेदनशील होकर बातें कर पायेंगे. डॉ शालिनी साबू ने अपनी बातों को कानूनी परिपेक्ष्य में प्रस्तुत करने की कोशिश की, जहां महिला अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है. अधिकतर जो महिलाओं को लेकर भेदभाव या फिर सामाजिक अत्याचार होते हैं, उसका कारण संपत्ति विवाद है, जो कि जमीन से बंधे हैं. कृषि और खनन जमीन पर केंद्रित रहता है. जमीन किसी दूसरे के हाथ में न जाये. इसके लिए अनेक महिला उत्पीड़न और अत्याचार झेलती हैं. कई कुप्रथा और रीति-रिवाज की जड़ों में यह है.

संगोष्ठी में विशेष सोविनियर का किया गया विमोचन

संगोष्ठी में विशेष सोविनियर का विमोचन किया गया, जिसमें झारखंड राज्य के राज्यपाल और कुलाधिपति संतोष गंगवार, विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो, झारखंड के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ सुदिव्य कुमार सोनू, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिमल प्रसाद सिंह, सेमिनार के समन्वयक डॉ अजय सिन्हा और आयोजन सचिव अमिता कुमारी के संदेशों को शामिल किया गया है. इसमें प्रमुख व्यक्तित्वों के संदेशों के साथ ही संगोष्ठी में भाग लेने वाले कुल 57 शोधार्थियों के शोध आलेखों को भी स्थान दिया गया है. महिलाओं के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आयामों पर किए गए शोधों का संग्रह है. इसमें प्रत्येक शोध पत्र के सारांश को शामिल किया गया है, जिससे महिला सशक्तीकरण और उनके अधिकारों के संदर्भ में किए गए महत्वपूर्ण अनुसंधानों का सार स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ANAND JASWAL

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ANAND JASWAL is a contributor at Prabhat Khabar.

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