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डाउन सिंड्रोम का कारण जेनेटिक गड़बड़ी और देर उम्र में मां बनना भी

Updated at : 21 Mar 2025 7:26 PM (IST)
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डाउन सिंड्रोम का कारण जेनेटिक गड़बड़ी और देर उम्र में मां बनना भी

एसपी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के द्वारा संचालित मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र के निदेशक सह विभागाध्यक्ष डॉ विनोद कुमार शर्मा की अध्यक्षता में 'वर्ल्ड डाउन सिंड्रोम डे' मनाया गया. डॉ शर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैनेटिक विकार है, जिसे जागरुकता कार्यक्रमों से कमी लाया जा सकता है. यह मानसिक मंदता का एक प्रकार है, जो 21वें गुणसूत्र में गड़बड़ी अर्थात एक अतिरिक्त क्रोमोजोम के हो जाने से होता है.

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मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र में मना वर्ल्ड डाउन सिंड्रोम डे, बोले डॉ शर्मा

संवाददाता, दुमका

एसपी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के द्वारा संचालित मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र के निदेशक सह विभागाध्यक्ष डॉ विनोद कुमार शर्मा की अध्यक्षता में ””वर्ल्ड डाउन सिंड्रोम डे”” मनाया गया. डॉ शर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैनेटिक विकार है, जिसे जागरुकता कार्यक्रमों से कमी लाया जा सकता है. यह मानसिक मंदता का एक प्रकार है, जो 21वें गुणसूत्र में गड़बड़ी अर्थात एक अतिरिक्त क्रोमोजोम के हो जाने से होता है. इस कारण ऐसे बच्चे का शारीरिक बनावट और मस्तिष्क में अंतर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है. बल्कि उसका बुद्धि लब्धि सामान्य बच्चों की तुलना में कम 40- 60 के बीच होता है. ””””इंप्रूव आवर सपोर्ट सिस्टम”””” थीम पर आधारित यह दिवस पूरे विश्व में जागरुकता व इसमें कमी लाने के उद्देश्य से मनाया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो पूरे विश्व में करीब पांच मिलियन से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं, जबकि भारत में करीब 3 से 5 लाख तक लोग पीड़ित बताये जाते है. डॉ शर्मा ने यह भी कहा कि डाउन सिंड्रोम के कारणों में जेनेटिक गड़बड़ी के अतिरिक्त, देर उम्र ( 35 वर्ष के बाद) में मां बनना, फैमिली हिस्ट्री आदि शामिल हैं.

धैर्य के साथ बच्चों की करें देखभाल : डॉ बिनीता

ऐसे बच्चों की पहचान उसके मानसिक क्षमता के अतिरिक्त परिलक्षित शारीरिक विशेषताओं यथा सिर बड़ा, छोटी और चपटी नाक, जीभ बड़ा, छोटी नाक, बड़ी जीभ, छोटा कद, मोटा हाथ और पैर, ढीली त्वचा आदि के साथ-साथ श्रवण, दृष्टि एवं हृदय संबंधी समस्याएं भी दृष्टिगोचर होती है. प्रसव पूर्व परीक्षण, क्रोमोसोमल विश्लेषण, शारीरिक परीक्षण आदि नैदानिक प्रक्रियाओं समेत चिकित्सा उपचार, व्यावसायिक व शैक्षणिक पुनर्वास के द्वारा उसके जीवन में कुछ सुधार लाया जा सकता है. मौके पर शिक्षिका डॉ सीमा कुमारी ने कहा कि ऐसे बच्चों को विशेष पुनर्वास की जरूरत होती है. वहीं समाजशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ बिनीता रानी टोप्पो ने परिवार को धैर्य के साथ देखभाल करने की सलाह दी और कहा कि समाज में इसकी विशेष जानकारी की आवश्यकता है. मंच संचालन डॉ त्रिजा जेनिफर टोप्पो तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ किलिश मरांडी ने किया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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