उत्तरजीविता बनाये रखने के लिए कार्बन का उत्सर्जन रोकना जरूरी
Updated at : 15 Nov 2017 3:55 AM (IST)
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कार्यक्रम. श्रीनगर के कलस्टर यूनिवर्सिटी में आयोजित सेमिनार में वीसी ने कहा दुमका : श्रीनगर के कलस्टर यूनिवर्सिटी द्वारा अब्दुल अहद आजाद मेमोरियल कॉलेज में ‘डिजास्टर रिसिरियेंस ऑफ कश्मीर इन द फेस ऑफ क्लाइमेट चेंज पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य वक्ता आमंत्रित किये गये सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के वीसी प्रो […]
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कार्यक्रम. श्रीनगर के कलस्टर यूनिवर्सिटी में आयोजित सेमिनार में वीसी ने कहा
दुमका : श्रीनगर के कलस्टर यूनिवर्सिटी द्वारा अब्दुल अहद आजाद मेमोरियल कॉलेज में ‘डिजास्टर रिसिरियेंस ऑफ कश्मीर इन द फेस ऑफ क्लाइमेट चेंज पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य वक्ता आमंत्रित किये गये सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के वीसी प्रो मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने प्लानेटरी फीवर ए ग्लोबल कंसर्न विषय पर मंगलवार के सत्र को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी उत्तरजीविता बनाये रखने के लिए कार्बन का उत्सर्जन रोकना होगा
और इसके वे सारे उपाय अपनाने होंगे, जिससे धरती का तापमान न बढ़े. उन्होंने कहा कि पृथ्वी की उत्पत्ति होने से लेकर अब तक पांच बार तापमान में परिवर्तन आया है. पिछली बार पृथ्वी का तापमान 65 मिलियन वर्ष पहले बढ़ा था, उस समय डायनासोर का राज था. मनुष्य की उत्पत्ति तब नहीं हुई थी. उस वक्त तापमान में वृद्धि का जो कारण था,
वह प्राकृतिक था. पूर्व की तुलना में उतने ज्वालामुखी अब नहीं फट रहे हैं और इससे पर्यावरण प्रदूषित भी नहीं हो रहे. पर 1950 के बाद से छठी बार परिवर्तन का जो दौर शुरू हुआ है, उसमें जीवों की हजारों प्रजातियां विलुप्त होती जा रही है. फाॅजिल्स प्यूल के जलने से कार्बन डाइ-आॅक्साइड बढ़ रहा है, जिससे धरती का तापमान बढ़ रहा है. प्रो सिन्हा ने कहा कि कार्बन डाइ-आॅक्साइड के बढ़ने से आनेवाले दिनों में वनस्पति का विकास अपेक्षाकृत तेजी से होगा. यह भी संभावना है
कि उसके आकार में भी परिवर्तन आयेगा. भले ही इससे हमें सांस लेने में उतनी कोई हानि नहीं होगी, पर जिस गति से यह बढ़ रहा है, वह गति बरकरार रही तो 250 साल के बाद वायुमंडल में 25 पेटाग्राम कार्बन की मात्रा बढ़ जायेगी और उससे पृथ्वी का तापमान 5 से 10 डिग्री सेंटीग्रेट तक बढ़ जायेगा. इससे ग्लेशियर भी पिघलेगा. केवल ग्रीनलैंड के ग्लेशियर के पिघलने से समुद्र 7 मीटर ऊपर आ जायेगा, तब मनुष्य ही विलुप्ति के कगार पर पहुंच जायेगा. प्रो सिन्हा ने कहा कि अगर हमें अपनी उत्तरजीविता बनाये रखनी है तो सबसे पहले वायुमंडल में कार्बन की बढ़ती मात्रा को रोकना होगा. इसे नियंत्रित करने की प्रक्रिया अपनानी होगी
. वहीं प्रो सिन्हा के अलावा इस विषय पर जेएनयू के स्कूल ऑफ इनवायरमेंटल साइंस के पूर्व डीन प्रो अत्री एवं भूगर्भ रसायनवेत्ता एएल रामानाथन ने भी अपने शोधपरक विचारों को रखा. मंगलवार के सत्र में कलस्टर यूनिवर्सिटी श्रीनगर के शेख जावेद अहमद, नोडल प्रिंसिपल यास्मीन अशाही, डीन एमए बाबा तथा कंट्रोलर इक्जामिनेशन मुम्ताज अली मौजूद थे.
जीवों की हजारों प्रजातियाें के विलुप्ति के कारण पर भी विस्तार से डाला प्रकाश
250 साल बाद वायुमंडल में 25 पेटाग्राम कार्बन की बढ़ जायेगी मात्रा
पृथ्वी का तापमान 5 से 10 डिग्री सेंटीग्रेट तक बढ़ने से कई परेशानियां होगी उत्पन्न
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