झरिया मास्टर प्लान के बावजूद 1.4 लाख परिवार अब भी आग और धंसती जमीन के बीच

Author Umesh singh|Edited by Priya Gupta
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अग्नि प्रभावित क्षेत्र में रहते लोग | Prabhat Khabar Network

अग्नि प्रभावित क्षेत्र में रहते लोग | Prabhat Khabar Network

झरिया मास्टर प्लान के बावजूद 1.4 लाख परिवार आज भी धंसती जमीन और आग के बीच रहने को मजबूर हैं। पुनर्वास में अनियमितता और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।

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दुनिया के सबसे बड़े कोयला खदान अग्नि क्षेत्र के रूप में पहचानी जाने वाली झरिया में पिछले 100 वर्षों से चल रहे अवैध खन, बालू भराई न होने, पानी के रिसाव और जमीन के नीचे लगी आग के कारण जमीन लगातार धंस रही है. जगह-जगह से धुआं और जहरीली गैस का रिसाव हो रहा है.भू-धंसान और अग्नि प्रभावित क्षेत्र के लोग रोज डर के साये में जीने को मजबूर हैं. इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार के कोयला मंत्रालय ने अग्नि और धंसान से प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने के लिए झरिया मास्टर प्लान-2 बनाया है. इसके तहत करीब 1.4 लाख परिवारों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार ने 5,940 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं.

सर्वे और पुनर्वास में अनियमितता का आरोप

स्थानीय लोगों का आरोप है कि बीसीसीएल के सर्वे में कई परिवारों के नाम छूट गए हैं. लिलोरी पथरा के लोग आज भी सुलगती आग के बीच रह रहे हैं क्योंकि उन्हें आवास नहीं मिला है. लोदना क्षेत्र के कुछ प्रभावित परिवारों को बेलगड़िया और करमाटांड़ में शिफ्ट किया गया है, लेकिन कई दशकों से रह रहे परिवारों का नाम सूची में नहीं है। बिना आवास के वे विस्थापन से बाहर हो गए हैं. लोगों ने बताया कि कोयला पर निर्भर परिवारों को नई जगह रोजगार नहीं मिल रहा है, जिससे उनके सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

स्थानीय लोगों ने मांग की है कि छूटे हुए परिवारों का फिर से सर्वे कराया जाए और प्रति परिवार 2 आवास दिए जाएं. लोगों का यह भी आरोप है कि विधायक, सांसद और प्रबंधन के कुछ खास लोगों ने आरा, बलिया, छपरा आदि जगहों से अपने लोगों के फर्जी आधार कार्ड और आवास की चिट्ठी बनाकर करमाटांड़ और कुसुम विहार कॉलोनी में बसाने का काम किया है. इस मामले को लेकर एक वरिष्ठ समाजसेवी और पत्रकार ने दिल्ली स्थित कोयला मंत्री को पत्र लिखकर विस्थापन में हुई अनियमितताओं से अवगत कराया है.

ये जीवन और पहचान का सवाल है

झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता मदन राम ने कहा कि झरिया विस्थापन सिर्फ घर बदलने का मामला नहीं है. ये जीवन, पहचान और आजीविका का सवाल है। 5,940 करोड़ का फंड और मास्टर प्लान कागज पर है, लेकिन जमीन पर अभी भी लोग आग और धंसती जमीन के बीच रहने को मजबूर हैं। अगर समय पर और सही सर्वे के साथ पुनर्वास नहीं हुआ तो झरिया की एक और बस्ती इतिहास बन जाएगी.


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